नई दिल्ली (वीएनआई) 5 जुलाई, भारतीय लोककला की अमर स्वर-सम्राज्ञी और पंडवानी गायन की सबसे बड़ी पहचान तीजन बाई का रविवार को 70 वर्ष की आयु में लंबी बीमारी के बाद रायपुर में निधन हो गया। उनके निधन के साथ भारतीय लोकसंगीत का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया। दशकों तक अपनी दमदार आवाज़, सशक्त अभिनय और अद्भुत प्रस्तुति शैली से महाभारत की कथाओं को जीवंत करने वाली तीजन बाई ने पंडवानी को गांवों की चौपाल से निकालकर विश्व मंच तक पहुंचाया।
8 अगस्त 1956 को छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई का बचपन आर्थिक अभावों में बीता। बेहद कम उम्र में उन्होंने अपने नाना से महाभारत की कथाएं सीखीं और मात्र 13 वर्ष की आयु में पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दी। उस समय पंडवानी में महिलाओं का मंच पर खड़े होकर प्रस्तुति देना स्वीकार नहीं किया जाता था, लेकिन तीजन बाई ने परंपराओं को चुनौती देते हुए कपालिक शैली में गायन शुरू किया और अपनी अलग पहचान बनाई।
गौरतलब है कि अपनी असाधारण कला के दम पर उन्होंने भारत ही नहीं, बल्कि यूरोप, अमेरिका, एशिया और अफ्रीका के अनेक देशों में पंडवानी की प्रस्तुतियां दीं। उनकी आवाज़ में महाभारत के पात्र सजीव हो उठते थे और यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी। उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारतीय कला और संस्कृति में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया। वर्ष 1988 में उन्हें पद्म श्री, 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2003 में पद्म भूषण, 2018 में जापान का प्रतिष्ठित फुकुओका पुरस्कार, 2019 में देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण तथा बाद में संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप से अलंकृत किया गया। इसके अलावा उन्हें कई विश्वविद्यालयों ने मानद उपाधियां भी प्रदान कीं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा कि तीजन बाई का जाना कला और संस्कृति की दुनिया के लिए अपूरणीय क्षति है। उन्होंने कहा कि पंडवानी को वैश्विक पहचान दिलाने में उनका योगदान सदैव याद रखा जाएगा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत सहित अनेक नेताओं, कलाकारों और सांस्कृतिक हस्तियों ने भी उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। सभी ने कहा कि तीजन बाई ने अपने जीवन से यह साबित किया कि प्रतिभा किसी भी कठिनाई से बड़ी होती है।
तीजन बाई केवल एक लोकगायिका नहीं थीं, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति की जीवंत पहचान थीं। उनकी बुलंद आवाज़ भले ही अब हमेशा के लिए शांत हो गई हो, लेकिन पंडवानी की हर गूंज में उनका नाम और उनकी विरासत सदैव जीवित रहेगी।
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