हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में जब भी मधुरता, संवेदनशीलता और शास्त्रीय संगीत की सुगंध से सजी धुनों की चर्चा होती है, तो सबसे पहले जिन नामों का स्मरण होता है, उनमें मदन मोहन का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। उनकी रचनाओं ने न केवल हिंदी सिनेमा को अनगिनत कालजयी गीत दिए, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि सच्चा संगीत समय की सीमाओं से परे होता है। उनके निधन के पाँच दशक बाद भी उनकी धुनें उतनी ही लोकप्रिय हैं, जितनी अपने दौर में थीं।
मदन मोहन कोहली का जन्म 25 जून 1924 को इराक की राजधानी बगदाद में हुआ था, जहाँ उनके पिता राय बहादुर चुन्नीलाल कोहली प्रशासनिक सेवा में कार्यरत थे। उनका परिवार मूल रूप से पंजाब से था और बाद में भारत लौट आया। यहीं उनका बचपन बीता और संगीत के प्रति उनका गहरा लगाव विकसित हुआ। विदेश में जन्म लेने के बावजूद उनका पूरा जीवन, शिक्षा और संगीत साधना भारत की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी रही।
फिल्मी दुनिया में कदम रखने से पहले उन्होंने कुछ समय भारतीय सेना में सेवा दी। इसके बाद वे आकाशवाणी, लखनऊ से जुड़े, जहाँ उन्हें देश के अनेक प्रतिष्ठित शास्त्रीय संगीतकारों और गायकों के साथ काम करने और उनसे सीखने का अवसर मिला। यही अनुभव आगे चलकर उनकी संगीत शैली की मजबूत नींव बने।
सन् 1950 में उन्होंने स्वतंत्र संगीत निर्देशक के रूप में अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की। उस दौर में जब तेज़ और लोकप्रिय धुनों का चलन बढ़ रहा था, मदन मोहन ने मधुरता, भावनाओं और शास्त्रीय संगीत को अपनी पहचान बनाया। ग़ज़लों पर उनकी असाधारण पकड़ के कारण उन्हें "ग़ज़लों का शहज़ादा" भी कहा गया। उनकी धुनों में भारतीय शास्त्रीय संगीत, काव्य और भावनाओं का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
लता मंगेशकर के साथ उनकी जोड़ी हिंदी फिल्म संगीत की सबसे यादगार संगीत साझेदारियों में गिनी जाती है। इसके अलावा मोहम्मद रफ़ी, तलत महमूद, आशा भोसले, मन्ना डे और अन्य महान गायकों के साथ भी उन्होंने अनेक अमर गीत रचे, जो आज भी संगीत प्रेमियों की पहली पसंद बने हुए हैं।
उनकी कालजयी रचनाओं में 'लग जा गले', 'नैना बरसे रिमझिम रिमझिम', 'आपकी नज़रों ने समझा', 'है इसी में प्यार की आबरू', 'तेरी आँखों के सिवा', 'तुम जो मिल गए हो', 'कर चले हम फ़िदा', 'दिल ढूँढ़ता है', 'बैयाँ न धरो', 'वो चुप रहें तो', 'मिलो न तुम तो', 'रंग और नूर की बारात', 'अगर मुझसे मोहब्बत है' और 'होके मजबूर मुझे' जैसे सदाबहार गीत शामिल हैं। इन गीतों की लोकप्रियता आज भी बरकरार है और वे रेडियो, टेलीविजन, डिजिटल प्लेटफॉर्म तथा संगीत समारोहों की शान बने हुए हैं।
अनपढ़, वो कौन थी?, हक़ीक़त, मेरा साया, दस्तक, हीर रांझा, मौसम, दुल्हन एक रात की, हिंदुस्तान की कसम और लैला मजनूँ जैसी फिल्मों में उनके संगीत ने फिल्मों की भावनात्मक गहराई को नई ऊँचाइयाँ दीं। वर्ष 1970 में फिल्म 'दस्तक' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला, जो भारतीय संगीत जगत में उनके असाधारण योगदान का सम्मान था।
मदन मोहन के निधन के लगभग तीन दशक बाद उनकी धुनों ने एक बार फिर दुनिया को मंत्रमुग्ध कर दिया। वर्ष 2004 में निर्देशक यश चोपड़ा की फिल्म 'वीर-ज़ारा' में उनकी कई अप्रयुक्त धुनों का उपयोग किया गया। इस फिल्म का निर्माण यश चोपड़ा और आदित्य चोपड़ा ने किया था, जबकि इसकी कहानी और पटकथा आदित्य चोपड़ा ने लिखी थी। मदन मोहन के मूल संगीत को उनके पुत्र संजीव कोहली ने नए रूप में प्रस्तुत किया। फिल्म के गीत 'तेरे लिए', 'ऐसा देश है मेरा', 'मैं यहाँ हूँ', 'दो पल' और 'ये हम आ गए हैं कहाँ' अत्यंत लोकप्रिय हुए और नई पीढ़ी को मदन मोहन की अद्भुत संगीत विरासत से परिचित कराया। यह भारतीय सिनेमा का एक दुर्लभ उदाहरण माना जाता है, जब किसी दिवंगत संगीतकार की धुनों ने वर्षों बाद भी एक नई फिल्म को ऐतिहासिक सफलता दिलाई।
14 जुलाई 1975 को मुंबई में मात्र 51 वर्ष की आयु में मदन मोहन का निधन हो गया। उनका जीवन भले ही छोटा रहा, लेकिन भारतीय संगीत को दिया गया उनका योगदान अमूल्य है। उनकी धुनों में आज भी वही ताजगी, वही संवेदना और वही आत्मीयता महसूस होती है, जिसने उन्हें अमर बना दिया।
कहा जाता है कि अच्छा संगीत कभी पुराना नहीं होता। मदन मोहन का संपूर्ण संगीत जीवन इस कहावत का जीवंत उदाहरण है। उनकी रचनाएँ आने वाली पीढ़ियों तक संगीत प्रेमियों के दिलों में गूंजती रहेंगी और उनका नाम भारतीय सिनेमा के महानतम संगीत निर्देशकों में सदैव स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा।
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