कराची का ताजमहल

By VNI India | Posted on 30th Oct 2026 | मनोरंजन
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कराची/नई दिल्ली. 30 अक्टूबर ( वीएनआई) पाकिस्तान के कराची शहर  में भी एक ताजमहल  रहा हैं , एक हिंदू मारवाड़ी कारोबारी शिव रतन मोहट्टा  ने अपनी पत्नी के लिए ये महल बनवाया था. इसी को बाद में कराची का ताजमहल के नाम से  पहचान मिली. ताजमहल जहा शाहजहॉ ने अपनी बेगम मुमताज की मौत के बाद उन की याद में बनवाया वही शिव रतन मोहट्टा ने अपनी पत्नी के जीवित रहते ही ये महल बनवा दिया था. दरअसल, उनकी पत्नी एक जानलेवा बीमारी से जूझ रही थीं. डॉक्टरों ने शिव रतन मोहट्टा से कहा कि इस बीमारी का इलाज ताज़ी हवा है. अगर उनकी पत्नी ऐसे माहौल में रहेंगी, तो उनकी सेहत बेहतर रहेगी.

शिव रतन मोहट्टा जानते थे कि  पत्नि के स्वास्थ लाभ के लिये कराची के समुद्र तट की ताज़ी हवा ही इस परेशानी का सबसे अच्छा हल है. इसलिए उन्होंने यहां एक बंगला बनवाने का फ़ैसला किया.  यह बंगला  भी असल में किसी महल से कम नहीं था.

बी बी सी की रिपोर्ट के अनुसार अहमद हुसैन आगा  नाम के एक विशेषज्ञ को इस इमारत का नक़्शा तैयार करने की ज़िम्मेदारी दी गई थी. उन्हें ख़ास तौर पर जयपुर से कराची बुलाया गया था. साल 1927 में बनकर तैयार हुआ मोहट्टा पैलेस मुग़ल वास्तुकला की ख़ूबसूरत झलक दिखाता है. इसे देखकर लगता है, जैसे राजस्थानी राजाओं के एंग्लो-मुग़ल महलों को दोबारा बनाया गया हो.इसके निर्माण में जोधपुर के गुलाबी पत्थर और गिज़री के स्थानीय पीले पत्थर इस्तेमाल किए गए हैं. इसके गुंबद इसकी ख़ूबसूरती को और बढ़ा देते हैं. इसकी मेहराबें, मीनारें और नक़्शे वाली टाइलें भी देखने लायक हैं. इस इमारत में बर्मा टीक की मज़बूत लकड़ी इस्तेमाल की गई है. पत्थरों पर मोर और फूलों के नक़्शे भी बनाए गए हैं. इनमें गेंदे के फूल ख़ास तौर पर दिखाई देते हैं.

इस रिपोर्ट के अनुसार किसी समय इसकी छत पर एक छोटा-सा मंदिर भी हुआ करता था.महल में रहने वाले लोग इसी सुरंग से मंदिर जाकर पूजा-पाठ करते थे. लेकिन समय के साथ इस इलाक़े में निर्माण होता गया. इसके बाद सुरंग को बंद कर दिया गया.  है.

दरअसल, पाकिस्तान बनने के बाद शिव रतन मोहट्टा कराची में ही रहना चाहते थे. लेकिन उनके लिए ऐसे हालात बना दिए गए कि उन्होंने मुंबई जाने का फ़ैसला कर लिया

 बाद में जिन्ना की बहन यहां रहीं ,फ़ातिमा जिन्ना ने पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के मुंबई वाले घर के बदले मोहट्टा पैलेस को चुना था. हालांकि, शुरुआत में उन्होंने इस इमारत में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई थी. लेकिन बाद में वह यहां रहने लगीं.जब यह इमारत फ़ातिमा जिन्ना को सौंपी गई, तब इसकी हालत बहुत ख़राब थी.  इमारत की सफ़ाई कराई गई. पक्षियों के घोंसले और मकड़ियों के जाले हटाए गए. इस तरह मोहट्टा पैलेस कुछ समय के लिए 'क़स्र-ए-फ़ातिमा' बन गयाफ़ातिमा जिन्ना लगभग साढ़े तीन साल मोहट्टा पैलेस में रहीं. यहीं उनका निधन हुआ. बाद में उन की छोटी बहिन शिरीन भी वही रहने लगी शिरीन  साल 1980 में अपने निधन तक यहीं रहीं. लेकिन इससे पहले ही मोहट्टा पैलेस के मालिकाना हक़ को लेकर विवाद शुरू हो गया था और मामला अदालत तक पहुंच गया था.

पैलेस में एक म्युजीयम भी हैं, जिस में नायाब वस्तुओं की वजह से इसे अनमोल धरोहर कहा जाता हैं.समय के साथ इस इलाक़े में ऊंची इमारतें बनती चली गईं. इस वजह से अब मोहट्टा पैलेस की छत से समुद्र का नज़ारा पहले जितना ख़ूबसूरत नहीं दिखाई देता.

एक दौर था, जब क्लिफ़्टन में बहुत कम आबादी थी. वहां समुद्र का पानी और रेत ही दिखाई देते थे.समय के थपेड़ों के साथ इस इलाक़े में ऊंची इमारतें बनती चली गईं. इस वजह से अब मोहट्टा पैलेस की छत से समुद्र का नज़ारा पहले जितना ख़ूबसूरत नहीं दिखाई देता.

समय गुजरा इस महल के मालिक बदले लेकिन इतना लंबा समय गुज़र जाने के बाद भी मोहट्टा पैलेस में जो आकर्षण और जादू मौजूद है, उसका मुक़ाबला कोई दूसरी इमारत नहीं कर सकती. साभार बी बी सी समाप्त


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