नई दिल्ली (वीएनआई) 19 जून, अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम को आगे बढ़ाने संबंधी समझौते पर हस्ताक्षर होने के साथ ही इसे लागू भी कर दिया गया है। इसे मध्य पूर्व में जारी तनाव और कई महीनों से चले आ रहे संघर्ष को समाप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने इसकी पुष्टि की है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस के एवियन-ले-बैंस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान इस समझौते पर हस्ताक्षर किए, जबकि ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने इस पर डिजिटल हस्ताक्षर किए हैं।
14 बिंदुओं वाले इस मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) के तहत रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होर्मुज़ जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने का निर्णय लिया गया है। साथ ही ईरान ने परमाणु हथियार विकसित न करने का वचन दिया है। देश के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए 300 अरब डॉलर की योजना भी प्रस्तावित की गई है, हालांकि इसमें अमेरिका का प्रत्यक्ष वित्तीय योगदान अनिवार्य नहीं होगा।
गौरतलब है कि यह समझौता 28 फरवरी को शुरू हुए अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच संघर्ष के लगभग चार महीने बाद सामने आया है। ट्रंप प्रशासन ने इसे "प्रदर्शन आधारित समझौता" बताया है। यानी ईरान को मिलने वाली आर्थिक और कूटनीतिक राहत उसकी प्रतिबद्धताओं के पालन पर निर्भर करेगी।
समझौते के तहत अमेरिका, ईरान और उनके सहयोगी सभी मोर्चों पर सैन्य गतिविधियां समाप्त करने पर सहमत हुए हैं। इसमें लेबनान भी शामिल है। दोनों पक्ष भविष्य में किसी प्रकार की सैन्य कार्रवाई शुरू नहीं करेंगे, एक-दूसरे को धमकी नहीं देंगे और क्षेत्रीय संप्रभुता का सम्मान करेंगे। हालांकि इस प्रावधान पर इज़राइल की आधिकारिक प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आई है।
दोनों देशों ने एक-दूसरे की संप्रभुता और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की भी प्रतिबद्धता जताई है। साथ ही 60 दिनों के भीतर एक व्यापक और अंतिम समझौते पर बातचीत पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है, जिसे आपसी सहमति से आगे बढ़ाया जा सकता है।
समझौते के अनुसार अमेरिका ईरान के खिलाफ लागू नौसैनिक नाकाबंदी को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करेगा और अगले 30 दिनों में बंदरगाहों पर लगाए गए प्रतिबंधों को हटाएगा। अंतिम समझौते के बाद अमेरिका ने ईरान के आसपास तैनात अपनी अतिरिक्त सैन्य उपस्थिति को भी कम करने का वादा किया है।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलना इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू माना जा रहा है। ईरान यह सुनिश्चित करेगा कि व्यापारिक और ऊर्जा परिवहन से जुड़े जहाज सुरक्षित रूप से इस मार्ग से गुजर सकें और उन पर कोई अतिरिक्त शुल्क न लगाया जाए। जलडमरूमध्य के बंद होने से भारत सहित कई देशों को तेल आपूर्ति और बढ़ती कीमतों की समस्या का सामना करना पड़ा था। इसके खुलने से वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता आने की उम्मीद है।
समझौते में ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर की निवेश योजना का भी प्रावधान है। अमेरिका आवश्यक लाइसेंस, छूट और अनुमतियां देगा, जबकि क्षेत्रीय साझेदार और निजी निवेशक इसमें भागीदारी कर सकेंगे।
अमेरिका ने ईरान पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की सहमति भी व्यक्त की है। हालांकि इसकी समयसीमा आगे की वार्ताओं में तय की जाएगी। प्रतिबंधों से ईरानी अर्थव्यवस्था को लंबे समय से भारी नुकसान उठाना पड़ा है।
परमाणु कार्यक्रम के मुद्दे पर ईरान ने आश्वासन दिया है कि वह परमाणु हथियार न तो विकसित करेगा और न ही प्राप्त करेगा। उसके पास मौजूद संवर्धित यूरेनियम को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) की निगरानी में कम संवर्धित स्तर पर लाया जाएगा। अमेरिका ने इसे अपनी बड़ी कूटनीतिक सफलता बताया है।
समझौते में यह भी प्रावधान किया गया है कि संवर्धित यूरेनियम से जुड़े मुद्दे के समाधान तक दोनों देश अपने परमाणु कार्यक्रमों में यथास्थिति बनाए रखेंगे। इस दौरान अमेरिका नए प्रतिबंध नहीं लगाएगा और तेल, बैंकिंग तथा परिवहन सेवाओं से जुड़ी कुछ छूट जारी रखेगा।
लंबे समय से विवाद का विषय रही ईरान की फ्रीज़ की गई संपत्तियों को लेकर भी सकारात्मक प्रगति हुई है। अमेरिका ने सिद्धांततः इन निधियों तक ईरान की पहुंच बहाल करने पर सहमति जताई है, लेकिन यह प्रक्रिया भी समझौते की शर्तों के पालन से जुड़ी रहेगी।
समझौते के कार्यान्वयन और निगरानी के लिए दोनों देश एक संयुक्त तंत्र स्थापित करेंगे। अंतिम समझौते को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी दिलाने की भी योजना है, जिससे उसे अंतरराष्ट्रीय कानूनी मान्यता मिल सके।
कुल मिलाकर यह समझौता केवल युद्धविराम तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें क्षेत्रीय सुरक्षा, परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक पुनर्निर्माण, प्रतिबंधों में राहत, समुद्री व्यापार और भविष्य के कूटनीतिक संबंधों की व्यापक रूपरेखा शामिल है। हालांकि कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अभी भी अंतिम सहमति बननी बाकी है, फिर भी इसे मध्य पूर्व में स्थिरता और शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
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