"इजराइली अरब" क्या इजरायल में नयी सरकार के गठन में निर्णायक बन सकते हैं.

By Shobhna Jain | Posted on 28th Oct 2026 | VNI स्पेशल
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नई दिल्ली  शोभना जैन  (वीएनआई ) 28 अक्टूबर इजरायली चुनाव परिणाम फिलहाल अधर में लटके प्रतीत होते हैं. गत 27 अक्टूबर को हुए चुनाव के बाद आए एग्जिट पोल के अनुमानों से संकेत मिलता है कि न तो बिन्यामिन नेतन्याहू के खेमे को और न ही  उनके प्रतिद्वंदी सेना के पूर्व कमांडर गादी आइज़ेनकोट के नेतृत्व वाली यहूदी विपक्षी पार्टियों को अपने दम पर संसद में बहुमत मिल सकता है. ऐसी अनिश्चय की स्थिति में सवाल पूछा जा रहा हैं कि इजरायल की अरब पार्टियां  क्या अगली सरकार के गठन में  अहम  भूमिका निभा सकती हैं. आधिकारिक नतीजों का अभी इंतज़ार हैहालांकि, अरब पार्टियों का प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि विपक्षी नेता उनकी भागीदारी या सरकार से बाहर रहते हुए समर्थन को स्वीकार करते हैं या नहीं. हालांकि चुनाव प्रचार के दौरान इस तरह के सहयोग पर आपत्तियां जताई गई थीं.   चुनाव जीतने के लिये किसी भी गठबंधन को 61 मतों की जरूरत हैं ,एक प्रमुख एग्जिट पोल में 120 सदस्यीय इजरायल संसद में नेतन्याहू  गठबंधन को - 50,नेतन्याहू विरोधी यहूदी पार्टियां- 52  जबकि अरब पार्टियां: राअम और जॉइंट लिस्ट- 18 को मत मिले हैं

यहां अहम बात यह है कि नेतन्याहू विरोधी दलों के पास संसद में बहुमत होने का मतलब अपने आप एक स्थिर सरकार बनाने की स्थिति पैदा होना नहीं है. नेतन्याहू का विरोध करने वाली पार्टियों के बीच इस बात पर मतभेद हैं कि वे अरब प्रतिनिधियों के साथ मिलकर काम कर सकती हैं या नहीं.

मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली यूनाइटेड अरब लिस्ट यानी राअम सरकार में शामिल होना चाहती है. उसकी प्राथमिकताओं में अरब समुदायों में अपराध पर अंकुश लगाना और आवास, बुनियादी ढांचे के साथ सार्वजनिक सेवाओं में सुधार करना शामिल है.

 दरसल 2021 में राअम नेफ़्टाली बेनेट के नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल हुई थी. इस गठबंधन ने शुरुआत में नेतन्याहू को सत्ता से हटाया था. हालांकि,  कुछ चुनाव विशेषज्ञों का मानना हैं कि यानी राअम अकेले 61 सीटों का बहुमत दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं होगी. इसके लिए अन्य दलों का समर्थन या संसद में किसी दूसरे तरह की व्यवस्था ज़रूरी होगी.

जॉइंट लिस्ट  गठबंधन ने नेतन्याहू की जगह दूसरी सरकार बनाने के लिए संसद में उसे समर्थन देने की इच्छा जताई है. इसके तहत वह सरकार में मंत्री पद लिए बिना भी उसे अहम संसदीय मतदान में समर्थन दे सकती है.इससे अरब पार्टियों के समर्थन से विपक्ष के नेतृत्व वाली अल्पमत सरकार को कामकाज चलाने में मदद मिल सकती है.

बहुसंख्यक अरब लोग उन लोगों के वंशज हैं, जो 1948 के अरब-इसराइल युद्ध के बाद इजरायल की ओर से घोषित सीमाओं के भीतर रह गए थे. इजराइल का गठन ब्रिटिश मैंडेट ऑफ फ़लस्तीन से हुआ था, जहाँ उस समय क़रीब 12 लाख अरब रहते थे.आज इजरायल की आबादी का करीब 21 प्रतिशत अरब है, यानी लगभग 20 लाख लोग. इनमें पूर्वी यरुशलम में रहने वाले कुछ लाख लोगों को छोड़कर सभी इजराइल के नागरिक हैं. पूर्वी यरुशलम के ये लोग स्थायी निवासी हैं और इस दर्जे के तहत उन्हें नागरिकों की तुलना में कम अधिकार हासिल हैं. अरब नागरिकों में बहुसंख्यक सुन्नी मुसलमान हैं.

हालांकि बड़ी संख्या में ईसाई और द्रूज समुदाय के लोग भी हैं. द्रूज समुदाय के लोग अपेक्षाकृत अधिक संख्या में अपनी पहचान इसराइली के रूप में स्वीकार करते हैं.

वैसे नेतन्याहू ने अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाने से इनकार किया है. आइज़ेनकोट और विपक्ष के कई अन्य सहयोगियों ने भी चुनाव प्रचार के दौरान ऐसी व्यवस्था का विरोध किया था. हालांकि, चुनाव के बाद की खबरों से संकेत मिलता है कि आइज़ेनकोट कुछ शर्तों के साथ सहयोग के लिए तैयार हो सकते हैं.

फिलहाल तो यही कहा जा सकता हैं कि अरब पार्टियों की सरकार में भागीदारी तय नहीं है. यहूदी पार्टियों के बीच व्यापक गठबंधन बनाकर उन्हें सरकार गठन की प्रक्रिया से बाहर रखा जा सकता है अगर गठबंधन को लेकर बातचीत पूरी तरह विफल हो जाती है, तो एक और चुनाव कराने की संभावना भी बनी रहेगी.

इसलिए अब सबसे अहम सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि अरब पार्टियों को कितनी सीटें मिलती हैं, बल्कि यह भी है कि विपक्षी नेता उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल करने और सरकार से बाहर रहते हुए उनके संसदीय समर्थन पर निर्भर रहने के बीच अंतर करते हैं या नहीं.

यही अंतर तय कर सकता है कि चुनाव के बाद नई सरकार बनती है या राजनीतिक गतिरोध जारी रहता है. समाप्त / वी एन आई समाचार सेवा


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