निशाने का बादशाह, खिलाड़ियों का गुरु:- जसपाल राणा की अमर विरासत

By Shobhna Jain | Posted on 12th Jun 2026 | खेल
जसपाल राणा

भारतीय खेल जगत में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो केवल अपनी उपलब्धियों के कारण नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी को दिशा देने के कारण अमर हो जाते हैं। भारतीय निशानेबाजी के ऐसे ही महानायक थे जसपाल राणा। विश्वस्तरीय निशानेबाज, रिकॉर्डधारी खिलाड़ी, सफल प्रशिक्षक और प्रेरणादायी व्यक्तित्व के रूप में उन्होंने भारतीय खेलों पर अमिट छाप छोड़ी। उनका जीवन संघर्ष, समर्पण, अनुशासन और उत्कृष्टता की ऐसी कहानी है जो आने वाली पीढ़ियों को लंबे समय तक प्रेरित करती रहेगी।


28 जून 1976 को उत्तराखंड के उत्तरकाशी में जन्मे जसपाल राणा का खेलों से जुड़ाव बचपन से ही हो गया था। उनके पिता नारायण सिंह राणा स्वयं एक उत्कृष्ट निशानेबाज, आईटीबीपी अधिकारी और बाद में उत्तराखंड के पहले खेल मंत्री रहे। उन्होंने अपने पुत्र की प्रतिभा को प्रारंभिक अवस्था में ही पहचान लिया था। निशानेबाजी उनके परिवार की पहचान बन चुकी थी। उनकी बहन सुषमा राणा और भाई सुभाष राणा भी राष्ट्रीय स्तर के निशानेबाज रहे, जिससे यह परिवार भारतीय शूटिंग जगत में विशेष स्थान रखता है।


कम उम्र में ही जसपाल राणा ने अपनी असाधारण प्रतिभा का परिचय देना शुरू कर दिया था। राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सफलता प्राप्त करने के बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करना शुरू किया। वर्ष 1994 उनके जीवन का स्वर्णिम वर्ष साबित हुआ, जब उन्होंने जापान के हिरोशिमा में आयोजित एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। मात्र 18 वर्ष की आयु में हासिल की गई यह सफलता भारतीय निशानेबाजी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर थी।


जसपाल राणा विशेष रूप से 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल स्पर्धा के महारथी माने जाते थे। उन्होंने एशियाई खेलों, राष्ट्रमंडल खेलों और विश्व स्तर की प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत को अनेक पदक दिलाए। राष्ट्रमंडल खेलों में उन्होंने कुल 15 पदक जीते, जिनमें 9 स्वर्ण, 4 रजत और 2 कांस्य पदक शामिल हैं। यह उपलब्धि उन्हें भारत के सबसे सफल राष्ट्रमंडल खिलाड़ियों की सूची में शामिल करती है।


विश्व निशानेबाजी प्रतियोगिताओं में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। जूनियर वर्ग में विश्व रिकॉर्ड स्थापित करना और बाद में वरिष्ठ वर्ग में विश्व रिकॉर्ड की बराबरी करना उनकी असाधारण क्षमता का प्रमाण था। उनकी सटीकता, मानसिक मजबूती और दबाव में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने की क्षमता उन्हें अपने समकालीन खिलाड़ियों से अलग बनाती थी। वे ऐसे खिलाड़ी थे जो लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने और कठिन परिस्थितियों में भी शांत बने रहने के लिए जाने जाते थे।


उनकी उपलब्धियों को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1994 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया। इसके बाद 1997 में उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री से नवाजा गया। खेलों में उनके दीर्घकालीन योगदान और प्रशिक्षक के रूप में उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें द्रोणाचार्य पुरस्कार भी प्रदान किया गया। बहुत कम खिलाड़ी ऐसे होते हैं जिन्हें खिलाड़ी और कोच दोनों रूपों में राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त करने का गौरव मिलता है।


हालांकि जसपाल राणा की उपलब्धियां केवल उनके अपने पदकों तक सीमित नहीं रहीं। खिलाड़ी जीवन के बाद उन्होंने भारतीय निशानेबाजी की नई पीढ़ी को तैयार करने का संकल्प लिया। एक प्रशिक्षक के रूप में उन्होंने अनेक प्रतिभाओं को निखारा और उन्हें विश्व मंच तक पहुंचाया। उनकी सबसे चर्चित शिष्या भारतीय स्टार निशानेबाज मनु भाकर रहीं।


मनु भाकर के करियर को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में जसपाल राणा की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके मार्गदर्शन में मनु ने 2018 राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता, युवा ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा और आईएसएसएफ विश्व कप प्रतियोगिताओं में अनेक स्वर्ण पदक अपने नाम किए। आगे चलकर उन्होंने एशियाई खेलों और विश्व चैम्पियनशिप में भी शानदार प्रदर्शन किया। वर्ष 2024 के पेरिस ओलंपिक में मनु भाकर ने दो कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। वे एक ही ओलंपिक में दो पदक जीतने वाली स्वतंत्र भारत की पहली महिला खिलाड़ी बनीं। महिलाओं की 10 मीटर एयर पिस्टल और मिश्रित टीम 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में उनके पदकों ने पूरे देश को गौरवान्वित किया। इन सफलताओं के पीछे जसपाल राणा की तकनीकी समझ, रणनीतिक सोच और मानसिक प्रशिक्षण की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। गुरु और शिष्या की यह जोड़ी भारतीय शूटिंग के इतिहास में हमेशा याद की जाएगी।


जसपाल राणा का पारिवारिक जीवन भी उतना ही प्रेरणादायक था। उनकी पत्नी आरुषि वर्मा राणा स्वयं निशानेबाजी से जुड़ी रही हैं और उन्होंने हमेशा उनके खेल जीवन में सहयोगी की भूमिका निभाई। उनके दो बच्चे हैं—पुत्र युवराज राणा और पुत्री देवांशी राणा। देवांशी ने भी अपने पिता की तरह निशानेबाजी में रुचि दिखाई। जसपाल राणा अपने बच्चों को अनुशासन, परिश्रम और खेल भावना का महत्व सिखाने पर विशेष जोर देते थे। वे अक्सर कहते थे कि परिवार का सहयोग किसी भी खिलाड़ी की सफलता की सबसे मजबूत नींव होता है।


जून 2026 में भारतीय खेल जगत को उस समय गहरा आघात लगा जब मात्र 49 वर्ष की आयु में जसपाल राणा का निधन हो गया। जर्मनी के म्यूनिख में आयोजित विश्व कप प्रतियोगिता से लौटने के बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई थी। हृदय संबंधी समस्या के कारण उनका उपचार किया गया, लेकिन वे स्वस्थ नहीं हो सके और उनका असामयिक निधन हो गया। उनके निधन से केवल भारतीय निशानेबाजी ही नहीं, बल्कि पूरे खेल जगत ने एक महान खिलाड़ी, कुशल प्रशिक्षक और प्रेरणास्रोत व्यक्तित्व को खो दिया।


जसपाल राणा का जीवन इस बात का उदाहरण है कि प्रतिभा के साथ यदि कठोर परिश्रम, अनुशासन और दृढ़ संकल्प जुड़ जाए तो असंभव लगने वाले लक्ष्य भी हासिल किए जा सकते हैं। उन्होंने भारतीय निशानेबाजी को विश्व मानचित्र पर स्थापित किया, अनेक रिकॉर्ड बनाए, देश को दर्जनों पदक दिलाए और नई पीढ़ी के खिलाड़ियों को सफलता का मार्ग दिखाया। उनके पदक, उनके रिकॉर्ड, उनके शिष्य और उनके आदर्श हमेशा जीवित रहेंगे। भारतीय खेल इतिहास में जसपाल राणा का नाम एक ऐसे निशानेबाज के रूप में सदैव याद किया जाएगा जिसने केवल लक्ष्य भेदना ही नहीं सीखा, बल्कि दूसरों को भी लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता दिखाया।


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