ये पिंजरा

By Shobhna Jain | Posted on 22nd Mar 2017 | देश
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जंगली परिंदों को पिंजरे नहीं भाते पिंजरा, लम्हा लम्हा रूह पर प्रहार है जहाँ लम्हे घंटों में ,घंटे दिनों में तब्दील हो जाते हैं काश परिंदे पिंजरे में कैद न होते ,काश परिंदे ,पिंजरे से बाहर सुरक्षित होते दुनिया की आँखें आदमी के लिए जेल हैं दुनिया के विचार आदमी के लिए पिंजरा

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