मुंशी प्रेमचंद के जन्मदिन पर गूगल डूडल का नमन

By Shobhna Jain | Posted on 31st Jul 2016 | देश
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नई दिल्ली,31 जुलाई(अनुपमाजैन/वीएनआई) गूगल ने भारत की जानी मानी हस्तियो को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किये जाने का सिलसिला जारी रखते हुए आज मनोभावनाओ के चितेरे ,हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकार 'कलम के सिपाही' मुंशी प्रेमचंद के जन्म दिन पर उनकी स्मृति को नमन किया है.मुंशी प्रेमचंद की 137 वीं जयंती पर आज सर्च इंजन गूगल ने उनके सम्मान में एक डूडल बनाया है. डूडल में एक मुंशी प्रेमचंद को देखा जा सकता है. इस डूडल पर क्लिक करने से प्रेमचंद के विकिपीडिया पन्ने को पढा जा सकता हैं. मुंशी प्रेमचंद ऐसे कालजयी उपन्यासकार थे, जिन्होंने अपनी लेखनी के दम पर पूरे विश्व में अपनी पहचान बनायी. उन्होंने 13 साल की उम्र में ही लिखना शुरू कर दिया था. उन्होंने पहले उर्दू और फिर हिंदी में लिखा. उनके निधन के 81 वर्ष बाद भी उनकी कालजयी रचना कफन, गबन, गोदान, ईदगाह, व नमक का दारोगा शतरंज के खिलाड़ी, पूस की रात, बड़े घर की बेटी हर किसी को बचपन की याद दिलाती है. इसके अलावा उन्होने कर्मभूमि, निर्मला, रंगभूमि और सेवासदन जैसे चर्चित उन्यास भी लिखे. उनका अंतिम उपन्यास 'गोदान' सबसे ज़्यादा मशहूर हुआ था 31 जुलाई 1880 को बनारस से लगभग छह मील दूर लमही नामक गांव में उनका जन्म हुआ था. प्रेमचंद का असल नाम धनपत राय था.प्रेमचंद के दादाजी गुरु सहाय सराय पटवारी और पिता अजायब राय डाकखाने में कर्ल्क थे. उनकी माता का नाम आनंदी देवी था. प्रेमचंद अपने माता-पिता की चौथी संतान थे. हिंन्दी के साथ वे उर्दू के महानतम भारतीय लेखकों में से एक हैं।उपन्यास के क्षेत्र में उनके योगदान को देखकर बंगाल के विख्यात उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें उपन्यास सम्राट कहकर संबोधित किया था। प्रेमचंद ने हिन्दी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया जिसने पूरी सदी के साहित्य का मार्गदर्शन किया। आगामी एक पूरी पीढ़ी को गहराई तक प्रभावित कर प्रेमचंद ने साहित्य की यथार्थवादी परंपरा की नींव रखी। उनका लेखन हिन्दी साहित्य की एक ऐसी विरासत है जिसके बिना हिन्दी के विकास का अध्ययन अधूरा होगा। वे एक संवेदनशील लेखक, सचेत नागरिक, कुशल वक्ता तथा सुधी संपादक थे। बीसवीं शती के पूर्वार्द्ध में, जब हिन्दी में की तकनीकी सुविधाओं का अभाव था, उनका योगदान प्रेमचंद आधुनिक हिन्दी कहानी के पितामह माने जाते हैं। प्रेमचंद ने हिंदी में यथार्थवाद की शुरूआत की। भारतीय साहित्य का बहुत सा विमर्श जो बाद में प्रमुखता से उभरा चाहे वह दलित साहित्य हो या नारी साहित्य,उसकी जड़ें कहीं गहरे प्रेमचंद के साहित्य में दिखाई देती हैं, प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में गाँव, सामाजिक ताने-बाने और ग़रीब किसान को ख़ास जगह दी थी। वीएनआई .

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