मैथिली-हिन्दी की साहित्यकार उषा दी नहीं रही.....

By Shobhna Jain | Posted on 14th Feb 2024 | साहित्य
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नई दिल्ली, 14 फरवरी, (वीएनआई)  मैथिली और हिन्दी की सिरमौर महिला साहित्यकार उषा किरण खान गुजर गईं। उनका निधन 79 वर्ष की आयु में बीती 11 फरवरी 2024 को पटना के एक गैर सरकारी अस्पताल में वृद्ध अवस्था जनित कारणों से हुआ बताया जाता है।

उषा दी का जन्म मराठी भाषी बालकृष्ण विष्णु महात्रे और राधाबाई महात्रे के दरभंगा के उपनगर लहेरियासराय के घर 24 अक्टूबर 1945 को हुआ था। वह अपनी 5 बहनों में दूसरी सबसे बड़ी थी। उषा दी के पति रामचन्द्र खां इंडियन पुलिस सर्विस में 1968 से 2003 तक रहे अफसर थे जिनका निधन पिछले बरस हुआ था। दोनों की चार संतानें हुई जिनमें अनुराधा का ही जिक्र ज्यादा होता है। उषा दी की बड़ी विवाहित बेटी अनुराधा अभी मध्य प्रदेश की अपर पुलिस महानिदेशक हैं। बाबा नागार्जुन उनके पिता के मित्रवत थे। हालांकि उनका विवाह अल्प आयु में हो गया था, उन्होंने अपनी नई गृहस्थी संभालने के साथ ही पढ़ाई जारी रखी और साहित्य अनुरागी औरतों के लिए ' आयाम ' नामक संगठन भी बनाया। उनको साहित्य में उनके योगदान के लिए भारत सरकार के नागरिक अनांकरण पद्मश्री से नवाजा गया था। उषा दी को उनके मैथिली उपन्यास ' भामति एक अविस्मरणीय प्रेमकथा ' साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। 

उषा दी ने बच्चों पर लिखा, ' हीरा डोम ' जैसे नाटक लिखे , कहानियां, उपन्यास और अपने संस्मरण भी लिखे। उषा दी के एक मैथिली उपन्यास 'अगनहिंडोला' का एक चरित्र अब्दुर्रहीम खानखाना के रिश्ते में नाना हसन खां मेवाती का है जिन्होंने 16 मार्च 1527 से आगरा से कुछ दूर खानवा गांव में पहले मुगल बादशाह जहीरुद्दीन बाबर और राजस्थान में चित्तौड़ के राजपूत सेनापति राणा सांगा के बीच खानवा की लड़ाई से मशहूर युद्ध में बाबर के खिलाफ मोर्चा लिया था। उनकी एक कहानी ' पीड़ा के दंश ' में पुरुष प्रधान हिन्दुस्तानी समाज में औरतों की योन दशा का लखनऊ की इस्मत चुगताई की उर्दू कहानी लिहाफ जैसा चित्रण है। उनकी कहानियां लीक से हट कर हैं जिनमें शहरी परिवेश ही नहीं गांवों की सरल जिंदगियों और  प्यार मोहब्बत के रंग भी है। उनका 2012 में छापा उपन्यास 'सृजनहार‘ भी चर्चित है। 


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