तिरुपति में भगवान वेंकटेश्वर के मंदिर में 'लडडू' प्रसाद ने पूरे किये तीन शतक

By Shobhna Jain | Posted on 6th Aug 2015 | VNI स्पेशल
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हैदराबाद 06 अगस्त (वीएनआई) तिरुपति में भगवान वेंकटेश्वर के मंदिर में प्रसाद के रूप में दिया जाने वाला 'पनयारम' यानी लड्डू अब तीन सौ बरस का हो गया है। तिरुपति के बड़े बड़े लड्डू अपने आकार ही नहीं बल्कि स्वाद के लिए भी जाने जाते हैं तिरुपति मंदिर के अधिकारियों के अनुसार इस पावन चढा्वे को दो अगस्त, 1715 को पहली बार भगवान को अर्पित किया गया था। दुनिया के सबसे धनी हिंदू मंदिर में आने वाले किसी भी श्रद्धालु की यात्रा इस लड्डू के बगैर पूरी नहीं होती। इसे आटा, चीनी, घी, तेल, इलायची और सूखे मेवे से बनाया जाता है। हालांकि मंदिर की ओर से विविध प्रकार के प्रसाद की पेशकश की जाती है लेकिन श्रद्धालुओं में लड्डू सबसे ज्यादा पसंदीदा है। तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) के अनुसार, साल 2014 में तीर्थयात्रियों को 90 करोड़ लड्डू प्रदान किया गया। तीन सौ ग्राम के एक लड्डू की सामान्य कीमत 25 रुपये है। लड्डू भगवान के प्रसाद रूप में चढ़ाने के लिए खरीदे जाते हैं। इन्हें खरीदने के लिए पंक्तियों में लगकर टोकन लेना पड़ता है। माना जाता है कि हर रोज़ करीब सवा लाख लड्डू तैयार किये जाते हैं मंदिर के लिए प्रसाद की बिक्री आय का बड़ा स्रोत है। इसके लिए साल 2014-15 का बजट 2,401 करोड़ रुपये का था। टीटीडी ने प्रसाद की बिक्री से 190 करोड़ रुपये और इतना ही श्रद्धालुओं के बालों से आय होने का अनुमान लगाया था। ब्रह्मोत्सवम के दौरान लड्डू प्रसाद को चौबीसों घंटे बेचा जाता है। ब्रह्मोत्सवम मूलतः प्रसन्नता का पर्व माना जाता है और यह तिरुपति का सबसे प्रमुख पर्व है। नौ दिनों तक चलने वाला यह पर्व साल में एक बार तब मनाया जाता है, जब कन्या राशि में सूर्य का आगमन होता है (सितंबर, अक्टूबर)। बीते साल ब्रह्मोत्सव के शुरुआती सात दिन में 180 लाख लड्डुओं की बिक्री हुई थी, जिसने सभी पिछले रिकार्ड तोड़ दिए थे। गौरतलब है कि आंध्रप्रदेश में भगवान वेंकटेश्वर के मंदिर में भक्तजनों को दिए जाने वाले ‘तिरुपति लड्डू’ को भौगोलिक कॉपीराइट प्रदान किया गया है, जिससे अन्य कोई भी इसी नाम से लड्डू न तो बना सकेगा और न ही इसकी मार्केटिंग कर सकेगा। लड्डू को लेकर क़ानूनी लड़ाई काफी दिनों से चल रही थी और तिरुपति के इस लड्डू को पेटेंट 2009 सितंबर में ही मिल गया था पर ट्रेड मार्क और जियोग्राफिकल इंडिकेशन रजिस्ट्री के कार्यालय ने साल 2014 में इन लड्डुओं को भौगोलिक संकेतक का दर्जा दिया जिसका सीधा अर्थ ये है कि भारत भर में अब कोई भी प्रतिष्ठान तिरुपति लड्डुओं का नाम अपने लड्डुओं के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकता। इस भव्य मंदिर की शान ही अलग है और इस मंदिर में 32 टन सोने के गहनों के अलावा 12,000 करोड़ रुपये की धनराशि जमा है।

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