संघर्षशील महिला केंद्र ने सैंट स्टीफेंस कॉलेज के प्रिंसिपल को बर्खास्त करने और स्वतंत्र जांच कि मांग की

By Shobhna Jain | Posted on 4th Jul 2015 | देश
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नई दिल्ली, 04 जुलाई, (वीएनआई) संघर्षशील महिला केंद्र (CSW) ने सैंट स्टीफेंस कॉलेज के यौन उत्पीड़न के मामले में प्रिंसिपल थम्पू की संदिग्ध भूमिका और डराने-धमकाने के प्रयास की भर्त्सना करते हुए स्वतंत्र जांच और प्रिंसिपल थम्पू को बर्खास्त करने की मांग की है | सीएसडब्लू ने बताया कि शिकायतकर्ता द्वारा जो टेप जारी हुआ है उससे साफ़ पता चलता है कि शिकायत्कर्ता को खुलेआम संस्था द्वारा दिग्भ्रमित किया गया है| जब वो दिसम्बर 2014 में प्रिंसिपल से मिली तो प्रिंसिपल समस्या से निजात दिलाने के बजाय और विशाखा गाइडलाइन्स का उलंघन करते हुए स्वयं ही मामले को सुलझाने की बात करने लगे| प्रिंसिपल ने शिकायतकर्ता को दिल्ली विश्वविद्यालय में 2 महीने से पेंडिंग पड़ा शिकायत भी वापस लेने को कहा| प्रिंसिपल द्वारा इस अवैधानिक मध्यस्थता के कारण अक्सर शिकायतकर्ता सहमी रहती थी| जब शिकायतकर्ता ने इस मध्यस्थता को नकार दिया तब शिकायत को जनवरी, 2015 में इंटरनल कंप्लेंट कमेटी (ICC) को भेजा गया| औपचारिक शिकायत के बावजूद आरोपी को कोषाध्यक्ष के पद पर रखा गया जिसका दुरूपयोग करते हुए उसने शिकायतकर्ता का मासिक वज़ीफ़ा को रोक दिया| सीएसडब्लू ने आगे बताया इंटरनल कंप्लेंट कमेटी (ICC) जिसमे प्रिंसिपल द्वारा चयनित सदस्य होते हैं, की मामले को लेकर पहली मीटिंग में शिकायतकर्ता को शुरुआती कार्यवाही से पहले दोबारा शिकायत के बारे में सोचने को कहा गया| ICC को ऐसे शिकायतों में निर्धारित तीन महीने के भीतर ही इन्क्वायरी करनी होती है परन्तु इन्क्वायरी को 6 महीने तक खीचा गया| शिकायतकर्ता के बयान को गलत तरीके से पेश करने और आरोपी के कोषाध्यक्ष के पद पर बने रहने के कारण अंततः शिकायतकर्ता ने कॉलेज से शिकायत वापस ली और पुलिस शिकायत दर्ज की| इस पूरे मामले से पता चलता है की किस असंवेदनशील और गैरजिम्मेदाराना तरीके से यौन उत्पीड़न के केस सैंट स्टीफेंस कॉलेज में हैंडल किए जाते है| इससे महिलाओं का कार्य-स्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध एवं प्रतितोष) अधिनियम, 2013 के अंतर्गत नियोक्ता/मालिक द्वारा चयनित ICC के समस्याओं से भी हमे अवगत कराता है| 2014 तक डी.यू मे यौन उत्पीड़न के मामलों को आर्डिनेंस XV-D के तहत देखा जाता था, जो की काफी विचार विमर्श के बाद बनी थी कि यौन उत्पीड़न के अंतर्गत क्या आता है, ऐसे शिकायत पर कार्यवाही करने का सबसे उचित तरीका क्या है और शिकायतकर्ता के उत्पीड़न को कैसे रोका जाए| हालांकि आर्डिनेंस XV-D में भी कुछ कमियां थी परन्तु उस समय ICC ज्यादा जवाबदेह था क्योंकि इसमें विश्वविद्यालय समाज से सदस्य चुन के आते थे| सीएसडब्लू ने उत्पीड़न के मामले में आगे बताया 2013 अधिनियम के तहत संस्था के हेड के द्वारा चयनित सदस्यों को रखा जाता है जो कि प्रशासन के पूरे नियंत्रण में रहता है और इसके तहत अपने लाभानुसार लोगों को बचाने की कोशिशें की जाती हैं| इसके साथ साथ इस नए आर्डिनेंस के तहत अगर शिकायतकर्ता आरोप को सिद्ध करने में नाकाम रहती है तो पीडिता के ऊपर कार्रवाई की जा सकती है जिसके कारण शिकायतकर्ता शिकायत दर्ज करने से पहले ही हतोत्साहित हो जाती हैं| परन्तु, महिलाओं का कार्य-स्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध एवं प्रतितोष) अधिनियम, 2013 के तहत भी प्रिंसिपल थम्पू द्वारा किया गया मध्यस्थता गैरकानूनी है|

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