नई दिल्ली, 07 जून (वीएनआई)भारत की खानपान परंपराएं जितनी विविध हैं, उतनी ही समृद्ध भी हैं। देश के विभिन्न क्षेत्रों में ऐसे अनेक व्यंजन मिलते हैं जो न केवल स्वाद में अद्भुत हैं बल्कि स्थानीय संस्कृति और जीवनशैली का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसा ही एक व्यंजन है पोहा, जिसने अपनी सादगी, पौष्टिकता और स्वाद के बल पर देशभर के लोगों के दिलों में विशेष स्थान बनाया है। इसी लोकप्रिय व्यंजन के सम्मान में प्रतिवर्ष 7 जून को विश्व पोहा दिवस मनाया जाता है।
पोहा चावल को विशेष प्रक्रिया द्वारा चपटा करके तैयार किया जाता है। यह भारत के सबसे लोकप्रिय नाश्तों में से एक है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और उत्तर भारत के कई हिस्सों में पोहा सुबह के भोजन का अभिन्न अंग है। विशेष रूप से इंदौर का पोहा-जलेबी संयोजन देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध है और शहर की पहचान बन चुका है।
विश्व पोहा दिवस का उद्देश्य इस पारंपरिक भारतीय व्यंजन को वैश्विक पहचान दिलाना, इसके पोषण संबंधी गुणों को उजागर करना तथा स्थानीय खाद्य संस्कृति के महत्व को रेखांकित करना है। हालांकि यह दिवस किसी सरकारी या अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा घोषित नहीं किया गया है, फिर भी पिछले कुछ वर्षों में खाद्य प्रेमियों, सोशल मीडिया समुदायों, रेस्तरां और पाक-कला विशेषज्ञों के प्रयासों से इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ी है। आज यह दिन भारतीय खाद्य विरासत के उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा है।
पोहा केवल स्वादिष्ट ही नहीं बल्कि स्वास्थ्यवर्धक भी माना जाता है। इसमें कार्बोहाइड्रेट, आयरन, फाइबर और कई आवश्यक पोषक तत्व पाए जाते हैं। कम तेल में बनने के कारण यह हल्का और आसानी से पचने वाला भोजन है। यदि इसमें मूंगफली, मटर, अंकुरित दालें, गाजर, टमाटर और अन्य सब्जियां मिलाई जाएं तो इसका पोषण मूल्य और बढ़ जाता है। यही कारण है कि पोहा बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी आयु वर्ग के लोगों की पसंद बना हुआ है।
पोहा की लोकप्रियता का एक प्रमुख कारण इसकी बहुमुखी प्रकृति है। इससे अनेक प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन तैयार किए जाते हैं। कांदा पोहा, इंदौरी पोहा, दही पोहा, तर्री पोहा, पोहा उपमा, पोहा चिवड़ा, पोहा नमकीन, पोहा भेल, पोहा कटलेट, पोहा टिक्की, पोहा पकोड़ा, पोहा चीला, पोहा ढोकला, पोहा इडली, पोहा उत्तपम, पोहा रोल, पोहा खीर, पोहा लड्डू और पोहा बर्फी जैसी अनेक रेसिपियां देशभर में लोकप्रिय हैं। विभिन्न राज्यों में स्थानीय मसालों और स्वाद के अनुसार पोहे को नए-नए रूप दिए गए हैं, जिससे इसकी विविधता और आकर्षण दोनों बढ़े हैं।
भारत में पोहे का इतिहास भी काफी पुराना माना जाता है। चावल प्रधान क्षेत्रों में इसे लंबे समय तक सुरक्षित रखने और शीघ्र भोजन तैयार करने के उद्देश्य से विकसित किया गया था। धीरे-धीरे यह आम जनजीवन का हिस्सा बन गया और आज भारतीय रसोई का एक महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थ है। रेलवे स्टेशनों, सड़क किनारे ठेलों, घरों और आधुनिक कैफे तक, पोहा हर जगह अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है।
आज जब फास्ट फूड और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का चलन तेजी से बढ़ रहा है, तब पोहा संतुलित और पारंपरिक भोजन का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह हमें याद दिलाता है कि स्वाद और स्वास्थ्य का संतुलन हमारी पारंपरिक रसोई में सदियों से मौजूद रहा है।
विश्व पोहा दिवस केवल एक व्यंजन का उत्सव नहीं है, बल्कि भारतीय खाद्य विरासत, स्थानीय कृषि परंपराओं और स्वस्थ जीवनशैली के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर भी है। यह दिवस हमें अपनी पाक-संस्कृति पर गर्व करने तथा आने वाली पीढ़ियों तक इन पारंपरिक स्वादों को पहुंचाने की प्रेरणा देता है। साधारण दिखने वाला पोहा वास्तव में भारतीय संस्कृति, सादगी, पोषण और स्वाद का अनूठा प्रतीक है।
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