नई दिल्ली (वीएनआई) 20जून रेगिस्तान का नाम सुनते ही आमतौर पर लोगों के मन में तपती रेत, ऊंचे बालू के टीले और दूर-दूर तक फैला सुनसान इलाका उभर आता है। यही कारण है कि अधिकांश लोग अफ्रीका के सहारा मरुस्थल को दुनिया का सबसे बड़ा रेगिस्तान मानते हैं। लेकिन यह सच नहीं है। दुनिया का सबसे बड़ा रेगिस्तान सहारा नहीं, बल्कि पृथ्वी के दक्षिणी छोर पर स्थित अंटार्कटिका है। यह तथ्य जितना हैरान करने वाला है, उतना ही रोचक भी।
दरअसल, रेगिस्तान की पहचान केवल गर्मी और रेत से नहीं होती। किसी क्षेत्र में अत्यंत कम वर्षा होने पर उसे रेगिस्तान माना जाता है। अंटार्कटिका में सालाना औसतन 50 मिलीमीटर से भी कम वर्षा होती है, इसलिए इसे ध्रुवीय मरुस्थल या कोल्ड डेजर्ट कहा जाता है। लगभग 1.4 करोड़ वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला अंटार्कटिका पृथ्वी का सबसे बड़ा रेगिस्तान है, जबकि सहारा दुनिया का सबसे बड़ा गर्म रेगिस्तान माना जाता है।
अंटार्कटिका की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां पृथ्वी के लगभग 70 प्रतिशत मीठे पानी और करीब 90 प्रतिशत बर्फ का भंडार मौजूद है। यदि किसी कारणवश यह सारी बर्फ पिघल जाए तो दुनिया के समुद्रों का जलस्तर कई मीटर तक बढ़ सकता है, जिससे तटीय शहरों और द्वीपीय देशों पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।
यह महाद्वीप पृथ्वी का सबसे ठंडा, सबसे शुष्क और सबसे तेज हवाओं वाला क्षेत्र माना जाता है। यहां तापमान माइनस 89.2 डिग्री सेल्सियस तक दर्ज किया जा चुका है, जो पृथ्वी पर अब तक का सबसे कम तापमान है। कई क्षेत्रों में हवाओं की रफ्तार 300 किलोमीटर प्रति घंटे से भी अधिक पहुंच जाती है।
बहुत कम लोग जानते हैं कि करोड़ों वर्ष पहले अंटार्कटिका बर्फ से नहीं, बल्कि घने जंगलों से ढका हुआ था। वैज्ञानिकों को यहां पेड़ों, पौधों और परागकणों के जीवाश्म मिले हैं, जिनसे पता चलता है कि लगभग 9 से 10 करोड़ वर्ष पहले यहां अपेक्षाकृत गर्म जलवायु थी और विशाल वन फैले हुए थे।
अंटार्कटिका का एक और अनोखा रहस्य है मैकमर्डो ड्राई वैली। इसे पृथ्वी के सबसे शुष्क स्थानों में गिना जाता है। यहां हजारों वर्षों से न तो बारिश हुई है और न ही बर्फबारी। इस क्षेत्र का वातावरण मंगल ग्रह की सतह से काफी मिलता-जुलता है, इसलिए वैज्ञानिक यहां भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों से जुड़ी महत्वपूर्ण शोध गतिविधियां करते हैं।
इस बर्फीले महाद्वीप में एक ऐसा प्राकृतिक चमत्कार भी है जिसे देखकर लोग हैरान रह जाते हैं। इसे "ब्लड फॉल्स" यानी रक्त झरना कहा जाता है। यहां एक झरने का पानी लाल रंग का दिखाई देता है, मानो किसी पहाड़ से खून बह रहा हो। वास्तव में यह रंग लोहे से भरपूर खारे पानी के ऑक्सीकरण के कारण बनता है।
अंटार्कटिका में पृथ्वी की सबसे रहस्यमयी पर्वतमालाओं में से एक गैंबुर्त्सेव पर्वत श्रृंखला भी मौजूद है। आश्चर्य की बात यह है कि यह पूरी पर्वतमाला कई किलोमीटर मोटी बर्फ की परत के नीचे दबी हुई है और इसकी खोज आधुनिक रडार तकनीक की मदद से की गई थी।
यहां स्थित माउंट एरेबस पृथ्वी का सबसे दक्षिणी सक्रिय ज्वालामुखी है। बर्फ से ढके महाद्वीप में सक्रिय ज्वालामुखी का होना अपने आप में प्रकृति का अद्भुत विरोधाभास है। इसकी एक विशेषता यह भी है कि इसके भीतर स्थायी लावा झील मौजूद रहती है।
दक्षिणी ध्रुव पर दिन और रात का क्रम भी बेहद अनोखा है। यहां सूर्य वर्ष में केवल एक बार उगता और एक बार अस्त होता है। परिणामस्वरूप लगभग छह महीने लगातार दिन और छह महीने लगातार रात रहती है। यह दृश्य दुनिया के किसी भी अन्य महाद्वीप से बिल्कुल अलग है।
अंटार्कटिका में कोई स्थायी मानव आबादी नहीं रहती। यह दुनिया का एकमात्र महाद्वीप है जहां कोई मूल निवासी नहीं है। यहां केवल वैज्ञानिक, शोधकर्ता और सहायक कर्मचारी अस्थायी रूप से रहते हैं। विभिन्न देशों के हजारों वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन, समुद्री जीवन, भूविज्ञान और अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़े महत्वपूर्ण शोध कार्यों में लगे रहते हैं।
बहुत कम लोगों को पता है कि अंटार्कटिका में दुनिया का सबसे दक्षिणी डाकघर भी मौजूद है। यहां आने वाले पर्यटक अपने परिवार और मित्रों को पोस्टकार्ड भेज सकते हैं। इतना ही नहीं, यहां एक एटीएम भी स्थापित किया गया है, जो इस निर्जन महाद्वीप को और भी रोचक बनाता है।
अंटार्कटिका उल्कापिंडों की खोज के लिए भी दुनिया की सबसे उपयुक्त जगहों में से एक है। सफेद बर्फ पर काले रंग के उल्कापिंड आसानी से दिखाई देते हैं, इसलिए यहां से हजारों दुर्लभ अंतरिक्षीय चट्टानें खोजी जा चुकी हैं। इनमें से कई ने सौरमंडल की उत्पत्ति को समझने में वैज्ञानिकों की मदद की है।
इस महाद्वीप के नीचे 300 से अधिक झीलें छिपी हुई हैं। इनमें से लेक वोस्तोक सबसे प्रसिद्ध है, जो लगभग चार किलोमीटर मोटी बर्फ की परत के नीचे स्थित है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस झील में ऐसे सूक्ष्म जीव मौजूद हो सकते हैं जो लाखों वर्षों से बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटे हुए हैं।
हालांकि अंटार्कटिका का वातावरण बेहद कठोर है, फिर भी यहां जीवन मौजूद है। पेंगुइन, सील, व्हेल और कई समुद्री जीव इस क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं। विशेष रूप से नीली व्हेल, जो पृथ्वी का सबसे बड़ा जीव है, अंटार्कटिका के आसपास के समुद्री क्षेत्रों में पाई जाती है।
्गौरतलब है कि अंटार्कटिका किसी एक देश का हिस्सा नहीं है। अंटार्कटिक संधि के तहत इसे वैज्ञानिक अनुसंधान और शांतिपूर्ण गतिविधियों के लिए सुरक्षित रखा गया है। यही कारण है कि यह महाद्वीप अंतरराष्ट्रीय सहयोग और वैज्ञानिक एकता का प्रतीक माना जाता है।
आज जलवायु परिवर्तन के दौर में अंटार्कटिका का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। यहां की बर्फ में होने वाले छोटे-से-छोटे बदलाव पर पूरी दुनिया की नजर रहती है, क्योंकि इसका सीधा प्रभाव समुद्र के जलस्तर, वैश्विक तापमान और मौसम प्रणाली पर पड़ता है।
अंटार्कटिका हमें यह सिखाता है कि प्रकृति की दुनिया हमारी कल्पनाओं से कहीं अधिक विशाल और रहस्यमयी है। जहां अधिकांश लोग रेगिस्तान को केवल रेत और गर्मी से जोड़ते हैं, वहीं बर्फ की सफेद चादर में लिपटा यह महाद्वीप साबित करता है कि दुनिया का सबसे बड़ा रेगिस्तान ठंड, विज्ञान, रहस्यों और आश्चर्यों का अनमोल खजाना है।
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