नई दिल्ली, 15 जुलाई, (वीएनआई/शोभना जैन) बढते दक्षिण कोरियाई और भारत के रिश्तों का गहरा "अयोध्या कनेक्शन" भी है.... कुछ वर्ष पूर्व राजधानी दिल्ली मे नियुक्त एक वरिष्ठ कोरियायी राजनयिक ने जब बताया कि उन के तथा उन के पुरखों के रक्त में कोरिया के एक पूर्व राजा के साथ साथ उस महाराजा की महारानी बनी, अयोध्या की एक राजकुमारी सूरिरत्ना का रक्त भी बहता है तो हैरानी हुई इस अयोध्या कनेकशन पर. राजनयिक के अनुसार इतिहास के पन्नों मे यह तथ्य दर्ज है. हंसते हुए उन्होने बताया कि उन जैसे काफी कोरियायी लोगो की नसो मे कोरियायी राजा और अयोध्या की राजकुमारी जो बाद मे कोरिया की महारानी बनी, हियो ह्वांग ओक का रक्त बहता है और अपने भारतीय ्दोस्तों को यह बात बताते हुए उन्हे लगता हैकि उन का नाता तो हजारों वर्ष पुराना हैं...इसी राजकुमारी की याद में अब कोरिया सरकार व उत्तर प्रदेश सरकार एक साथ मिल कर अयोध्या मे एक स्मारक संग्रहालय बना रहे है.भौगोलिक दृष्टि से भले ही दोनो देशो के बीच दूरी रही हो लेकिन दोनो देश भारत दौरे पर आये दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे-इन ने भी विशेष तौर पर इस अयोध्या कनेक्शन की चर्चा की.
बहरहाल 2000 पूर्व दक्षिण कोरिया में ब्याही अयोध्या की राजकुमारी और बाद में बौद्ध धर्म की साझी सांस्कृतिक, आध्यात्मिक डोर से बंधे इन रिश्तों से आगे बढ कर अगर आज के दौर की बात करे तो निश्चय ही कोरियायी राष्ट्रपति मून जे-इन की भारत यात्रा ऐसे वक्त हुई जब कि कोरिया प्रायद्वीप मे तेजी से बदल रहे समीकरणो के चलते उत्तर पूर्व एशिया की भू राजनैतिक स्थति एक नया रूप ले रही है. पिछले कुछ वर्षों से दोनो देशों के बीच प्रगाढ व्यापारिक रिश्तो के अलावा संबंधों का दायरा बढ कर "सामरिक साझीदारी" , सांस्कृतिक और दोनों देशों की जनता के बीच आपसी संपर्क बढाने पर जोर दिया जा रहा हैं. दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून के अनथक प्रयासों से हुए अमरीका उत्तर कोरिया शिखर वार्ता सफलता से होने के बाद अब अमरीका,चीन सहित दुनिया भर की निगाहे इस समझौते के सफल क्रियान्वन पर टिकी है, चीन इस क्षेत्र में भी लगातार अपना दबदबा बना रहा है, अमरीका चीन युद्ध के काले बादल मंडरा ही रहे है. ऐसे मे भारत और कोरिया दोनों का ही प्रयास हैं कि आपसी हित के मुद्दो पर दोनो देश आपसी सहयोग से निबटेंगे. दरअसल 2015 मे प्रधान मंत्री मोदी की कोरिया गणराज्य यात्रा के दौरान दोनो देशो ने अपने उभयपक्षीय संबंधो के दायरे को बढाकर विशेष सामरिक साझीदारी लाने पर सहमति दी थी.
हाल की मून की भारत यात्रा के दौरान हुए मोदी-मून शिखर ्वार्ता के बाद "विशेष रणनीतिक साझेदारी" के दूसरे चरण के शुरू होने की उम्मीद है. निश्चय ही श्री मोदी के "एक्ट ईस्ट" और मून की "नई दक्षिण नीति" ने उभययपक्षीय संबंधों का दायरा और व्यापक किया है. गत नवंबर में राष्ट्रपति मून के 'नई दक्षिण नीति' की घोषणा के साथ ही भारत-दक्षिण कोरिया के रिश्ते में एक नए चरण की शुरुआत हुई है. कोरिया प्रायद्वीप मे दोनो देशों के शांति प्रयासों के साथ भारत प्रशांत क्षेत्र की भौगोलिक स्थति से दोनो देश नजदीक से जुड़े हुए है, दोनो ही देशों के लिये भारत प्रशांत क्षेत्र की महत्ता बढती जा रही है, खास तौर पर यह यात्रा ऐसे वक्त हो रही है कि जब भारत प्रशांत नीति भारत की प्राथमिकता सूची मे है. ऐसे ही अन्य क्षेत्रीय और वैश्विक महत्व के विभिन्न मुद्दों पर दोनो देशों के बीच आपसी समझ निरंतर बढ रही है और दोनो मिल कर अनेक क्षेत्रों मे काम कर है.पिछले वर्ष राष्ट्रपति पद के चुनाव प्रचार के दौरान श्री मून ने अपने देश की परंपरा गत विदेश नीति से हट कर एलान किया कि द. कोरिया भारत के साथ दुनिया की चार महाशक्तियॉ अमरीका, रूस, चीन और जापान जैसे संबंध रखेगा. कोरिया प्रायद्वीप मे अगर शांति प्रयासों की बात करे तो भारत हमेशा बातचीत के जरिए कोरियाई प्रायद्वीप के परमाणु निरस्त्रीकरण की वकालत करता रहा है. और दक्षिण कोरिया भी इन वर्षों में यही बात करता रहा है.दूसरी तरफ किम जोंग के उतर कोरिया के साथ भी भारत के लगातार सम्बंध बनाए रखने का फ़ायदा भारत-दक्षिण कोरिया में बढ़ती दोस्ती को होगा.
दरअसल इस क्षेत्र के लिये भी भारत- द.कोरिया रिश्ते आज खास तौर पर अहम है. अब जबकि उत्तर कोरिया ने दुनिया के बाकी देशों के लिए अपने दरवाज़े खोलने शुरू किए हैं तो भारत उसे अपने चीन-पाकिस्तान वाले पारम्परिक सामरिक गठजोड़ से बाहर निकलना चाहेगा. भारत खास कर उत्तर कोरिया के पाकिस्तान के साथ उसके परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों और इस क्षेत्र पर उसके सुरक्षा प्रभावों को लेकर चिंतित है. उत्तर कोरिया और पाकिस्तान दोनों ही चीन के साथ घनिष्ठ संबंध रखते हैं जो भारत-दक्षिण कोरिया संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु भी है. कोरिया प्रायद्वीप मे अगर शांति प्रयासों की बात करे तो भारत हमेशा बातचीत के जरिए कोरियाई प्रायद्वीप के परमाणु निरस्त्रीकरण की वकालत करता रहा है और दक्षिण कोरिया भी इन वर्षों में यही बात करता रहा है. दूसरी तरफ किम जोंग के उत्तर कोरिया के साथ भी भारत के लगातार सम्बंध बनाए रखने का फ़ायदा भारत-दक्षिण कोरिया में बढ़ती दोस्ती को होगा. जिस तरह से राष्ट्रपति मून जे-इन अपनी "नई दक्षिण नीति" के तहत अपना 'थ्री पी'-पीपल,प्रोस्पेरिटी, पीस के एजेंडा ्के साथ भारत आये, जो कि सांस्कृतिक और पर्यटन संबंधों 'समृद्धि' का आर्थिक साझेदारी के निर्माण से और 'शांति' उनकी क्षेत्रीय चुनौतियों खास कर कोरियाई प्रायद्वीप पर सुरक्षा की स्थिति को लेकर उनकी सोच को साझा करने का हवाला देती है, और दोनों कोरियाई देशों के साथ अपने ताल्लुकात को बनाए रखने में भारत की स्थायी रुचि का कारण भी यही है
वास्तव मे दोनों देशों के बीच व्यापार बढने की प्रचुर संभावनाये है अलबत्ता इस संबंध मे हुई सहमति के बावजूद आपसी व्यापार इतना बढा नही है लेकिन अब हालात और माहौल बदल रहे है. असल मे दोनों देशों के बीच व्यापार बढने का यह बहुत अच्छा अवसर है. चीन के साथ अमरीकी मिसायल सुरक्षा कवच "ठड' के सोल मे तैनाती के बाद से चीन दक्षिण कोरिया से क्षुब्ध है, ऐसे मे कोरिया की नजर अपने निर्यात के लिये भारतीय बाजार पर लगी है.भारत के आर्थिक विकास में दक्षिण कोरिया के क्या मायने है या क्या मायने हो सकते है इसे इस बात से समझा जा सकता है कि भारत की आबादी दक्षिण कोरिया से 24 गुना अधिक है जबकि प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में यह दक्षिण कोरिया का महज सोलहवां हिस्सा ही है. असल मे प्रधान मंत्री मोदी की भी प्राथमिकता हैं कि द.कोरिया भारत मे भारी निवेश करे खास तौर पर कि आधारभूत संरचना क्षेत्र विशेष तौर पर रखे तथा जल पोत निर्माण जैसे भारी उद्द्योगो मे निवे्श करे.
एक राजनयिक के अनुसार राष्ट्रपति मून का अपनी 'नई दक्षिण नीति' के तहत भारत के साथ संबंधों को चीन के स्तर के बराबर रखने का लक्ष्य भारत की बड़ी क्षमता को दर्शाता है.भारत और दक्षिण कोरिया का द्विपक्षीय व्यापार भी पिछले साल 20 अरब अमरीका डॉलर का आंकड़ा पार कर चुका है,जबकि दक्षिण कोरिया के साथ चीन 12 गुना ज़्यादा 240 अरब डॉलर का व्यापार करता है. इसी तरह, चीन में नौ गुने अधिक 57 अरब डॉलर के निवेश के मुकाबले दक्षिण कोरिया का भारत में कुल निवेश 6.8 अरब डॉलर है. पिछले तीन सालों में उनके व्यापार में 17 से 20 अरब डॉलर की वृद्धि देखी गई है और दोनों पक्षों ने इसे 40 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित कर लिया है.कोरियाई ब्रांड आज भारत के घर घर में उपलब्ध हैं और उनकी कुछ कंपनियां पहले से ही 'डिजिटल इंडिया' और 'मेक इन इंडिया' में योगदान दे रही हैं.आज यहां की कंपनियां भारत समेत पूरी दुनिया में कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फ़ोन और ऑटोमोबाइल दे रही हैं और बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रही हैं.श्री मोदी और मून ने हाल ही में नोएडा में दुनिया के सबसे बड़े मोबाइल प्लांट का उद्घाटन किया था, कोरियायी कंपनी हर साल 12 करोड़ मोबाइल फोन बन सकेगे.
दोनों देश अपने व्यापारिक रिश्ते एक दूसरे के पूरक बनाने की मुहिम मे हैं. दक्षिण कोरिया के पास उन्नत तकनीक और विशेषज्ञों के साथ साथ पूंजी मौजूद है, वहीं भारत के पास बहुत बड़ा बाज़ार और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध कच्चे माल तो हैं लेकिन यहां प्रत्यक्ष बुनियादी ढांचे की कमी है. ्वस्तुतः दक्षिण पर बल देने की कोरियायी नीति के जरिये द.कोरिया अमरीका जैसे पुराने दोस्तो पर अपना निर्भरता कम करना चाहता है ऐसे में भारत के साथ संबंध बढाना उस के लिये अहम है. सॉफ्ट वेयर प्रोद्द्योगिकी,बॉयो टेक, साईबर टेक्नोलोजी, हेल्थ केयर , उर्जा मे संयुक्त रूप से शोध और दोनो देशो के वि्शेषज्ञ मिल कर काम कर रहे है. वैसे भारत ने कोरिया के साथ सिविल परमाणु सहयोग समझौता किया है ्हालांकि अभी तक यह कार्य रूप नही ले पाया है.
राजनयिक के अनुसार जिस तरह से राष्ट्रपति मून जे-इन अपनी "नई दक्षिण नीति" के तहत अपना 'थ्री पी'-पीपल,प्रोस्पेरिटी, पीस के एजेंडा के साथ भारत आये, जो कि सांस्कृतिक और पर्यटन संबंधों 'समृद्धि' का आर्थिक साझेदारी के निर्माण से और 'शांति' उनकी क्षेत्रीय चुनौतियों खास कर कोरियाई प्रायद्वीप पर सुरक्षा की स्थिति को लेकर उनकी सोच को साझा करने का हवाला देती है, और दोनों कोरियाई देशों के साथ अपने ताल्लुकात को बनाए रखने में भारत की स्थायी रुचि का कारण भी यही है. साभार-लोकमत (लेखिका वीएनआई न्यूज़ की प्रधान संपादिका है)
No comments found. Be a first comment here!