18 जुलाई को फिर रचा इतिहास, 'श्रीहरिकोटा' से 'विक्रम-1' की सफल उड़ान

By VNI India | Posted on 18th Jul 2026 | देश
विक्रम-1

श्रीहरिकोटा (वीएनआई )18 जुलाई, ‘श्रीहरिकोटा' स्थित 'सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र' से 18 जुलाई को 'विक्रम-1' रॉकेट के सफल प्रक्षेपण के साथ भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया। यह तारीख इसलिए भी बेहद खास मानी जा रही है क्योंकि 18 जुलाई 1980 को भारत ने 'एसएलवी-3' के माध्यम से अपने पहले स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण में सफलता प्राप्त की थी। लगभग 46 वर्ष बाद इसी दिन हैदराबाद स्थित निजी कंपनी 'स्काईरूट एयरोस्पेस' ने भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट 'विक्रम-1' सफलतापूर्वक लॉन्च कर एक और ऐतिहासिक उपलब्धि अपने नाम कर ली। इसके साथ ही भारत निजी क्षेत्र द्वारा ऑर्बिटल रॉकेट विकसित और प्रक्षेपित करने वाले दुनिया के चुनिंदा देशों में शामिल हो गया।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस ऐतिहासिक अभियान का नाम 'मिशन आगमन' रखा गया। यह मिशन भारत में निजी अंतरिक्ष क्षेत्र की नई शुरुआत का प्रतीक माना जा रहा है। वर्ष 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने के बाद यह पहली बार है जब किसी भारतीय निजी कंपनी ने अपने ऑर्बिटल रॉकेट के जरिए सफलतापूर्वक उपग्रहों को पृथ्वी की निचली कक्षा यानी 'लो अर्थ ऑर्बिट' में स्थापित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह उपलब्धि भारत को वैश्विक वाणिज्यिक उपग्रह प्रक्षेपण बाजार में नई पहचान दिलाएगी।

करीब 22 मीटर ऊंचा 'विक्रम-1' लगभग 350 किलोग्राम तक का पेलोड 'लो अर्थ ऑर्बिट' में पहुंचाने में सक्षम है। रॉकेट में तीन ठोस ईंधन चरणों के साथ अंतिम चरण में अत्याधुनिक 3डी-प्रिंटेड तरल ईंधन इंजन का उपयोग किया गया है। इसकी कार्बन-फाइबर कंपोजिट संरचना इसे हल्का, मजबूत और अपेक्षाकृत कम लागत वाला बनाती है। आधुनिक एवियोनिक्स, सटीक नेविगेशन प्रणाली और उन्नत प्रोपल्शन तकनीक इसे छोटे उपग्रहों के व्यावसायिक प्रक्षेपण के लिए अत्यंत उपयुक्त बनाती है।

बताया जा रहा है कि इस मिशन के जरिए कई भारतीय और विदेशी तकनीकी पेलोड अंतरिक्ष में भेजे गए। इनमें भविष्य की अंतरिक्ष तकनीकों का परीक्षण, उपग्रह प्रणालियों का प्रदर्शन, रोबोटिक तकनीक, वैज्ञानिक उपकरण तथा अन्य अनुसंधान संबंधी प्रयोग शामिल हैं। मिशन का उद्देश्य रॉकेट की प्रणोदन प्रणाली, मार्गदर्शन, नेविगेशन, नियंत्रण, संचार और ऑर्बिटल क्षमता का वास्तविक परिस्थितियों में सफल परीक्षण करना भी था।

इस मिशन की एक दिलचस्प बात यह रही कि निर्धारित प्रक्षेपण से कुछ मिनट पहले स्वचालित सुरक्षा प्रणाली ने तकनीकी जांच के लिए काउंटडाउन रोक दिया। सभी प्रणालियों की दोबारा जांच और सुरक्षा संबंधी पुष्टि के बाद लगभग 35 मिनट पश्चात प्रक्षेपण किया गया। अंतरिक्ष विशेषज्ञों के अनुसार, यह दर्शाता है कि किसी भी मिशन में सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जाता और सफलता से पहले प्रत्येक प्रणाली की बारीकी से जांच की जाती है।

'स्काईरूट एयरोस्पेस' की स्थापना वर्ष 2018 में 'इसरो' के पूर्व वैज्ञानिक 'पवन कुमार चंदाना' और 'नागा भरत डाका' ने की थी। कंपनी ने वर्ष 2022 में 'विक्रम-एस' नामक भारत का पहला निजी सब-ऑर्बिटल रॉकेट सफलतापूर्वक लॉन्च कर अपनी तकनीकी क्षमता का परिचय दिया था। 'विक्रम-1' उसी उपलब्धि का अगला और सबसे महत्वपूर्ण चरण माना जा रहा है, जिसने भारतीय निजी अंतरिक्ष उद्योग को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाई है।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, प्रधानमंत्री 'नरेंद्र मोदी' ने इस सफलता को भारत के युवाओं की प्रतिभा, वैज्ञानिक सोच और नवाचार की जीत बताते हुए इसे देश के अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक क्षण कहा। बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री का अपने हाथों से लिखा 'वंदे मातरम्' संदेश वाला एक विशेष पोस्टकार्ड भी प्रतीकात्मक रूप से इस मिशन के साथ अंतरिक्ष में भेजा गया, जिसने इस उपलब्धि को और अधिक यादगार बना दिया।

इस मिशन में कई अनूठे पेलोड भी शामिल रहे। इनमें प्रयोगशाला में विकसित हीरे से जुड़ा विशेष वैज्ञानिक पेलोड, भविष्य की अंतरिक्ष तकनीकों के परीक्षण उपकरण, अंतरिक्ष मलबे के अध्ययन से संबंधित प्रयोग तथा 18 कैरेट सोने से तैयार एक सूक्ष्म कलाकृति शामिल थी, जिसमें भारत के महान वैज्ञानिक 'डॉ. विक्रम साराभाई', 'डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम' और नोबेल पुरस्कार विजेता 'सी.वी. रमन' को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

विशेषज्ञों का मानना है कि 'विक्रम-1' की सफलता केवल एक रॉकेट लॉन्च नहीं बल्कि भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के लिए नए युग की शुरुआत है। आने वाले वर्षों में छोटे उपग्रहों की बढ़ती वैश्विक मांग को देखते हुए भारतीय निजी कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में नए अवसर खुलेंगे। यह उपलब्धि 'मेक इन इंडिया', 'स्टार्टअप इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' जैसे अभियानों को भी नई मजबूती प्रदान करेगी। 'विक्रम-1' ने यह साबित कर दिया है कि अब भारत केवल सरकारी अंतरिक्ष अभियानों तक सीमित नहीं है, बल्कि निजी क्षेत्र भी विश्वस्तरीय अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी विकसित कर वैश्विक मंच पर अपनी मजबूत पहचान बनाने की क्षमता रखता है।

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