चुनाव आयोग का उच्चतम न्यायालय में संयुक्त हलफनामा- एसआईआर संबंधी तीनोंआदेश तीनो की सर्सम्मति से

By Shobhna Jain | Posted on 27th Oct 2026 | देश
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नई दिल्ली शोभना जैन (वीएनआई) 27अक्टूबर     चुनाव आयोग ने  आज  एस आई आर पर मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों के बीच  कथित मतभेद  की खबरों पर स्पष्टीकरण देते हुये उच्चतम न्या्यालय में  तीनों चुनाव आयुक्तों द्वारा संयुक्त हलफ्नामा दायर  किया और  कहा कि  जून 2025 से मई 2026 के बीच जारी किए गए  एसआईआर से जुड़े तीनों आदेश सर्वसम्मति से जारी किए गए थे और वे क़ानूनी प्रावधानों के अनुरूप थे.
चुनाव आयोग ने    आज इस मामले में उच्चतम  न्यायलय में सुनवाई  से  पहले कल रात  न्यायालय में दाखिल एक हलफ़नामे में यह बात कही है. यह हलफ़नामा उस याचिका के जवाब में दाखिल किया गया है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर स्पेशल इंटेसिंव रिविजन यानीएसआईआर को लेकर एकतरफ़ा फ़ैसले लेने का आरोप लगाया गया है. अब इस मामलें ्पर अगली सुनवाई 17 नंवबर को होगी. न्यायलय ने इस मामलें मे  राहुल गॉधी सहित अन्य याचिका कर्ताओं को चुनाव आयोग द्वारा दायर हलफनामा का जबाव देने के लिये दस दिन का समय दे दिया हैं
 याचिका में कहा गया है कि इन फ़ैसलों के कारण मतदाता सूची के ड्राफ्ट फेज में 13.36 करोड़ नाम हटा दिए गए. उप निर्वाचन आयुक्त के हस्ताक्षर वाला यह हलफ़नामा मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से संयुक्त रूप से दाखिल किया गया है.
 निर्वाचन आयोग ने यह भी कहा कि उसके हलफनामे को आयोग के तीनों सदस्यों ने सर्वसम्मति से मंज़ूरी दी है.
मीडिया  रिपोर्ट के अनुसार हलफ़नामे पर मुख्य चुनाव आयुक्त से दोनों चुनाव आयुक्त की सहमति की बात इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से मेल नहीं खाती है, जिसमें बताया गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने एसआईआर में कई मामलों खुल असहमति दर्ज कराई थी.
संविधान के एक विशेषज्ञ के अनुसार कोर्ट में सुनवाई केवल इसी मुद्दे पर नहीं बल्कि चुनाव आयोग की अन्य कार्यप्रणालियों पर भी है.
यह जनहित याचिका यानी पीआईएल 'द इंडियन एक्सप्रेस' की उन ख़बरों के बाद दाखिल की गई, जिनमें कहा गया था कि निर्वाचन आयोग के दोनों आयुक्तों ने  स्पेशल इंटेसिंव रिविजन यानीफॉर्म 6 में बदलाव का विरोध किया था. उनका तर्क था कि इस फॉर्म में बदलाव केवल केंद्र सरकार ही कर सकती है.
भारत के चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच  ने आज इस जनहित याचिका और एसआईआर से संबंधित अन्य याचिकाओं पर सुनवाई  की. हाल के हफ्तों में एसआईआर की प्रक्रिया की गहन जांच-पड़ताल हुई है.
चुनाव आयोग ने इस याचिका पर सुनवाई को लेकर भी सवाल उठाए हैं. आयोग ने इसे ग़लत धारणाओं पर आधारित बताते हुए कहा कि यह पूरी तरह एक अख़बार की ख़बर पर आधारित है.
अपने हलफ़नामे में निर्वाचन आयोग ने फॉर्म 6 में संशोधन की बात से भी इनकार किया है. इस वैधानिक फॉर्म का इस्तेमाल मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए आवेदन करने में किया जाता है. आयोग ने कहा कि उसने केवल उस घोषणा-पत्र के फॉर्मैट को सुव्यवस्थित किया था, जिसका इस्तेमाल बिहार में एसआईआर के दौरान किया गया था.
आयोग के मुताबिक, ऐसा प्रक्रिया में तेज़ी लाने और उन मतदाताओं की मैपिंग करने के लिए किया गया, जो बिहार में मतदाता सूची के एसआईआर के दौरान नहीं हो सकी थी. आयोग ने कहा कि इसके परिणामस्वरूप बिहार में मतदाताओं को दावे और आपत्तियों के चरण में फॉर्म 6 के साथ जरूरी दस्तावेज भी जमा करने पड़े थे.
फॉर्म 6, जिसके ज़रिए नागरिक मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए आवेदन करते हैं, इस विवाद के केंद्र में है.
इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''मई में, किसी भी बदलाव से पहले, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने कहा था कि मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 में संशोधन किए बिना इस फॉर्म को बदला नहीं जा सकता. सुखबीर सिंह संधू ने भी इस बात से सहमति जताई थी. इसके बावजूद फॉर्म 6 के ऑनलाइन संस्करण में बदलाव कर दिया गया. जुलाई में संधू को इसकी जानकारी एक अख़बार की ख़बर से मिली और अगस्त में उन्होंने ऑनलाइन फॉर्म में जोड़े गए घोषणा-पत्र को "अनधिकृत/अवैध" बताया.''

हलफ़नामे में अब तर्क दिया गया है कि एसआईआर के लिए जो घोषणा-पत्र जोड़ा गया था, वह वैधानिक फॉर्म में संशोधन नहीं, बल्कि एक अलग दस्तावेज़ था. हालांकि, इसमें यह स्वीकार किया गया है कि ऑनलाइन घोषणा-पत्र को इस तरह समझा जा सकता था, मानो फॉर्म 6 में संशोधन किया गया हो, जबकि ऐसा कोई संशोधन नहीं हुआ था. हलफ़नामे के मुताबिक़, इसे सुधारने के लिए अधिकारियों को "कुछ क़दम उठाने की ज़रूरत थी".
आयोग के वोटर्स रजिस्ट्रेशन सेक्शन ने 21 अक्टूबर को यह फ़ैसला किया कि एसआईआर घोषणा-पत्र को ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में वैधानिक फॉर्म 6 से अलग रखा जाएगा.
हलफ़नामे में यह नहीं बताया गया कि जुलाई में ऑनलाइन व्यवस्था को किसने मंज़ूरी दी थी. हलफ़नामे में कहा गया है कि घोषणा-पत्र को "फॉर्म 6 के ऑनलाइन पेज में शामिल किया गया था लेकिन यह नहीं बताया गया कि ऐसा किसने किया.
इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है, ''हलफ़नामे में पश्चिम बंगाल का विवरण भी उतना ही अहम है. इसमें कहा गया है कि मतदाताओं को मतदाता सूची में बहाल करने के आदेशों के ख़िलाफ़ अपीलें राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय में अधिकारियों ने दाखिल की थीं. हलफनामे के मुताबिक, "इन मामलों को आयोग के संज्ञान में नहीं लाया गया". इसमें यह भी कहा गया है कि अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत अपील दाखिल करने का अधिकार था.''
रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने सबसे पहले इस मुद्दे पर सवाल उठाया था. सात अगस्त को, एक अख़बार में अपीलों की ख़बर आने के बाद, उनके कार्यालय ने राज्य के प्रभारी अधिकारी से "तथ्यात्मक स्थिति" मांगी. पाँच दिन बाद तीसरे चुनाव आयुक्त  संधू ने उसी अधिकारी से पांच सवाल पूछे. रिकॉर्ड के मुताबिक, जोशी ने उनसे कहा था कि अधिकारी ने बताया है कि उनके पास इस मामले का विवरण नहीं है.'' ्समाप्त


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