संयुक्त राष्ट्र सुधार : कब खत्म होगा भारत का इंतजार

By Shobhna Jain | Posted on 4th Oct 2020 | VNI स्पेशल
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नई दिल्ली, 04 अक्टूबर, (वीएनआई) प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महा सभा के विशेष अधिवेशन में एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र में  सुधारों की मांग शिद्दत से उठातें हुए इस विश्व संस्था के नीति निर्धारक स्वरूप में भारत की हिस्सेदारी की मॉग पुरजोर तरीकें से उठाते हुए कहा " आखिर भारत को कब तक संयुक्त राष्ट्र के नीति  निर्धारक स्वरूप का  हिस्सा होने का इंतजार करना होगा.उन्होंने कहा "भारत के लोग संयुक्त राष्ट्र के सुधार को लेकर जो प्रक्रिया चल रही है, उसके पूरा होने का लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं. भारत के लोग चिंतित हैं कि क्या ये प्रक्रिया कभी तार्किक अंत तक पहुंच पाएगी. आखिर कब तक भारत को संयुक्त राष्ट्र के निर्णय लेने की व्यवस्था से अलग रखा जाएगा." निश्चित तौर पर विश्व की इस प्रतिनिधि संस्था में विश्व की बदलती भौगोलिक राजनैतिक वास्तविकताओं के अनुरूप अपने को सार्थक और उपयोगी बनाने के लिये इस में सुधार बहुत जरूरी हैं और इसे अधिक लोकतांत्रिक, व्यापक प्रतिनिधित्व वाली बनाने के लिए इस की नीति निर्धारक ताकतवर निकाय सुरक्षा परिषद १५ सदस्यीय स्वरूप को व्यापक बनाने के लियें भारत सहित अनेक देश मॉग करते रहे हैं.पिछले काफी वर्षों से भारत विश्व पटल पर अपनी निरंतर मजबूत होती साख के मद्देनजर सुरक्षापरिषद की  स्थाई सदस्यता की दावेदारी के लियें न/ न केवल अपने लियें आवाज उठाता रहा हैं बल्कि  साथ ही जर्मनी, ब्राजील तथा जापान को इस में प्रतिनिधित्व दियें जाने की मॉग करता रहा हैं.सवाल हैं कि भारत को इस विश्व संस्था के ताकतवर कक्ष में बैठने के लिएं कब तक इंतजार करना होगा ताकि संस्था  व्यापक प्रतिनिधित्व वाली  बन सकें और  सही मायनें में सामूहिक आवाजों से विश्व समस्याओं से निबटने का  प्रभावी रास्ता खोजा जा सकें.

इस में कोई दो राय नही हैं कि व्यापक सुधारों के बिना संयुक्त राष्ट्र विश्वसनीयता के संकट का सामना कर रहा है.खास तौर पर आज के दौर में दुनिया को एक बहुपक्षीय मंच की जरूरत है, जो आज की आवशयकताओं और  भौगोलिक  राजनैतिक चुनौतियों से निबट सकें, सबको अपनी बात रखने का मौका दे और समकालीन चुनौतियों का समाधान कर मानव कल्याण पर ध्यान दे, तभी इस  विश्व संस्था की उपयोगिता और सार्थकता बनी रह सकती हैं. देखा गया हैं कि अनेक गंभीर अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम से निबटने में यह सक्षमता से प्रभावी कदम नहीं उठा पाया , हाल ही में कोविड से निबटनें में विश्व बिरादरी को एक जुट करने में भी इस की यही स्थति रही.ऐसी स्थति में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के व्यापक विस्तार की मॉग जोर पकड़ती जा रही हैं और भारत की दावेदारी को खासा मजबूत माना जा रहा हैं.

संयुक्त राष्ट्र में भारत की आवाज को प्रभावी रूप से मुखर करने और इस विश्व संस्था के ताकतवर नीति निर्धारक निकाय, सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता  के लियें भारत की दावेदारी को और गति देने के प्रयासों से जुड़ें संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई प्रतिनिधि रह चुके सैयद अकबरुद्दीन के अनुसार" निश्चित तौर पर  भारत हर पैमाने से सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता पाने के लिये सही पात्र हैं. भारत की वैध आकांक्षायें हैं, उच्च लक्ष्य और विचार.विश्व पटल पर भारत का सम्मान हैं और समय भी उस के पक्ष में है.कुछ असहमति वाली आवाजों को छोड़ कर कुल मिला कर भारत की दावेदारी को व्यापक समर्थन हासिल हैं, लेकिन विस्तार से जुड़े अनेक और जटिल मुद्दें भी हैं. हमें धैर्यपूर्वक अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में आगे बढना होगा.बदलाव चाहने से नहीं बल्कि समय़ से होंगे. " अकबरुद्दीन मानते हैं " वैसे भी सुरक्षा परिषद में  स्थाई सदस्यता दावेदारी का मुद्दा मात्र भारत  केन्द्रित नहीं हैं,यह अनेक अहम पहलूओं से यह जुड़ा हैं, इस ताकतवर निकाय में अफ्रीका का प्रतिनिधित्व, वीटो के अधिकार के औचित्य को ले कर उठ रहें सवाल,चीन द्वारा  विस्तार में डाली जाने वाली अड़चनें , ऐसे तमाम मुद्दें है जो परिषद के व्यापक विस्तार के मुद्दें से जुड़े हैं . भारत के मजबूत पक्ष के साथ यह भी सच हैं कि विश्व व्यवस्था में बदलाव में समय लगता हैं." इसी क्रम में भारत को संयुक्त राष्ट्र में पूर्ण बहुमत के चुनाव के जरियें अंतर राष्ट्रीय न्यायालय आई सी जे के लियें २०१७ में  हासिल  प्रतिनिधित्व की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के  ७० वर्ष बाद भारत को यह स्थान हासिल हुआ. इस चुनाव में ुच्चतम न्यालय के न्यायाधीश रहे न्यायमूर्ति दलबीर भंडारी  सं्युक्त राष्ट्र महासभा द्वारा पूर्ण बहुमत से आई सी जे  के लियें निर्वाचित हुए.चुनाव में सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य रहे ब्रिटेन ने अपने उम्मीदवार को  न्यायमूर्ति भंडारी से लगातार पिछड़्तें देख मैदान से चुनाव के अंतिम दौर में वापस ले लिया.पिछलें ७१ वर्षों में यह पहली बार था  कि  था जब ब्रिटेन का आई सी जे में प्रतिनिधित्व नही रहा. यह न/न केवल भारत की कूटनीतिक सफलता  थी बल्कि संयुक्त राष्ट्र सुधारों की दिशा में एक कदम माना गया जो कि इस बात का ्द्योतक रहा कि विश्व व्यवस्था बदल रही हैं और दुनिया के काफी देश इस बदलाव  को चाहते हैं.

 ्द्वितीय युद्ध की विभीषका से घबरायें विश्व ने एक जुट हो कर विश्व चुनौतियों से निबटने के लियें  में संयुक्त राष्ट्र का गठन किया, लेकिन विश्व  अब पूरी तरह से बदल चुका है महाशक्तियों के मायने बदल गए हैं. कई देश सैन्य और आíथक ताकत के रूप में उभरे हैं. इसलिए इस बदलते अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में सबसे ज्यादा जरूरत शक्ति संतुलन की महसूस की जा रही है.  भारत संयुक्त राष्ट्र में व्यापक सुधारों का सदैव समर्थक रहा है. सुरक्षा परिषद में सुधार 1993 से ही संयुक्त राष्ट्र के एजेंडे में है. संयुक्त राष्ट्र का अस्तित्व ही सुरक्षा परिषद पर आधारित है. उसके सारे कार्यक्रम तब तक कार्यरूप नहीं ले सकते, जब तक सुरक्षा परिषद की उस पर स्वीकृति नहीं हो.संयुक्त राष्ट्र का  गठन अक्टूबर १९४५ में हुआ था, तब 51 देश इसके सदस्य थे, परंतु अब यह संख्या 193 हो चुकी है। ऐसे में सुरक्षा परिषद के विस्तार की अपरिहार्यता समझी जा सकती है. हालांकि 1965 में इसका एक बार विस्तार किया गया थ. मूल रूप से इसमें 11 सीटें थीं-5 स्थायी और 6 अस्थायी. विस्तार के बाद सुरक्षा परिषद में कुल 15 सीटें हो गईं, जिसमें 4 अस्थायी सीटों को जोड़ा गया, लेकिन स्थायी सीटों की संख्या पूर्ववत ही रही. तब से सुरक्षा परिषद का विस्तार नहीं हुआ है. सुरक्षा परिषद में प्रतिनिधित्व के मामले में जहां तक स्थायी सदस्यों (चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका और रूस) का सवाल है, वह आनुपातिक नहीं है. न तो भौगोलिक दृष्टि से और न ही क्षेत्रफल तथा संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों की संख्या या आबादी की दृष्टि से. इस तथ्य के बावजूद की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का 75 प्रतिशत कार्य अफ्रीका पर केंद्रित है, फिर भी इसमें अफ्रीका का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है. यही कारण है कि अफ्रीकी देशों का भी एक गुट ‘सी-10’ किसी अफ्रीकी देश को इसमें शामिल करने की वकालत कर रहा है.

 

परिषद के स्थाई सदस्य पी ५ यानि महाशक्तियों को हासिल वीटो अधिकार, इस का दुरूपयोग वैसे भी सवालों के घेरे में हैं और फिर इन में मतभेद की स्थिति में वीटो पावर भी अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है.भारत सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए जी-4 देशों के प्रस्ताव का समर्थन करता है. इसमें भारत, जर्मनी, ब्राजील और जापान शामिल हैं. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के बुनियादी ढांचे में बदलाव के लिए 2005 में जी-4 का गठन किया गया था. वैसे जी-4 के अतिरिक्त इटली के नेतृत्व में ‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ भी सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग करता है. इसके अतिरिक्त सिंगापुर, स्विट्जरलैंड, कोस्टारिका इत्यादि देशों का एक छोटा समूह ‘स्मॉल-5’ सुरक्षा परिषद में पारदर्शिता लाने की मांग कर रहा है. भारत की नीति एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका के 42 देशों के गुट को, जिसे ‘एल-69’ ग्रुप कहते हैं एवं अफ्रीकन यूनियन के 55 सदस्य देशों को साथ लेकर सुरक्षा परिषद में सुधारों की साझा रणनीति बनाने की थी, जो काफी सफल भी रही है.गौरतलब हैं कि इसी वर्ष जून में भारत १८४ के भारी बहुमत से  १५ सदस्यीय सुरक्षा परिषद के अस्थाई सद्स्य के रूप में २०२१-२२ की अवधि के लिये चुना गया ,हालांकि एशिया प्रशांत क्षेत्र से वह एक मात्र उम्मीदवार था लेकिन विश्व के शक्ति समीकरण में यह भारत की एक  कूटनीतिक विजय तो हैं ही.

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक , दूसरा सबसे बड़ा जनसंख्या वाला देश भी है प्रधानमंत्री मोदी ने भी कहा है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा ऐसा लोकतांत्रिक देश है, जहां विश्व की 18 प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या रहती है, जहां सैकड़ों भाषाएं और बोलियां हैं, कई पंथ और विचारधाराएं हैं. ऐसे में भारतीय प्रतिनिधित्व या यूं कहें  कुछ अन्य देशों के भी व्यापक प्रतिनिधित्व के बिना सुरक्षा परिषद में संपूर्ण वैश्विक प्रतिनिधित्व क्या सही मायनें में कहा जा सकता हैं. निश्चित तौर पर भारत के परिषद में आने  से वैश्विक स्तर पर शांति, समृद्धि एवं मानवीय सरोकारों के प्रति भारत कहीं अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकेगा. समाप्त


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