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'एक झलक दिखा छिप जाने वाले कृष्ण' के साथ 'वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर की सतरंगी होली'


admin ,Vniindia.com | Friday March 02, 2018, 11:40:04 | Visits: 160







वृंदावन, मथुरा, 2 मार्च (शोभनाजैन/वीएनआई) वृंदावन का मशहूर बांके बिहारी मंदिर, मंदिर का पूरा प्रांगण अबीर और गुलाल की संतरंगी धूल से स्वप्निल सा हो गया है। गुलाब, गेंदे और मोगरे के फूलों की वर्षा हो रही है। मंदिर के पुजारी और भक्‍त प्रांगण में विशाल बर्तनों में रखे खुशबूदार रंगीन पानी की फुहारे पिचकारियों से भक्‍तों पर बरसा रहे है। अबीर, गुलाल और सतरंगे रंगों में रंगे लोग अपनी पहचान खो चुके हैं। वे अब सिर्फ भक्‍त है जो अबीर गुलाल के 'सतरंगी बादलों' की धुंध में अपने बांके बिहारी की एक झलक पाने उनके साथ होली खेलने को बेताब है और बांके बिहारी है जो बार बार अपनी एक झलक दिखा कर पर्दे में जा छिपतें हैं। मंदिर के पुजारी भक्तो को भगवान ्की एक झलक दिखा कर पर्दा गिरा रहे है,फिर पर्दा उठा रहे है लेकिन इन भक्‍तों के हुजम, और मंदिर मे 'राधे राधे, जय हो बांके बिहारी' के जयघोष से बेखबर, मंदिर के प्रांगण के एक कोने में वहा बिखरे फूलो ्के बीच वो बैठी खड़ी है,  चांदी से बाल, स्वर्णिम आभा समेटे वर्ण ,आस पास रंग बरस रहे है लेकिन मानो वो इस पल सबसे बेखबर सफेंद, धवल धोती, दमकते माथे पर चंदन का टीका, आंखों से बरसते आसुओं के बीच लगातार मद्धम स्वर में गा रही है, 'हमसे परदा करो न हे मुरारी, वृदांवन के हो बांके बिहारी'



वृदावन मे बीसियो बरस से रह रही है विधवाओ मे से एक है यह विधवा मॉ है और उन हजारो विधवा मॉओ मे शामिल है जिनमे से अधिकतर अपने परिवारो द्वारा त्यागे जाने के बाद अधिकतर यहा दशको से भीख मॉग कर गुजर बसर रह रही थी लेकिन जाने-माने समाज सुधारक और 'सुलभ इंटरनेशनल' के संस्थापक बिंदेश्वर पाठक जो कि देश विदेश में विधवा विरोधी मान्यताओं के विरोध में अभियान चलाने सहित जन कल्याण क़ार्यो के लिए जाने जाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विधवाओं की स्थिति के बारे में 2012 की गई टिप्पणी और सुलभ के इस दिशा मे किये गये समाजिक कार्यो का संग्यान लेने के बाद , सुलभ अपनी पहल पर तभी से वाराणसी व वृंदावन में  विधवाओं की देखरेख कर रहा है।बिंदेश्वर पाठक ने बताया कि सुलभ ने उन्हें (विधवाओं) समाज की मुख्यधारा से जोडऩे की कोशिश कर रहा है, और ये विधवा मॉ भी उन्ही विधवा मॉ मे शामिल है जो सुलभ के इन प्रयासो और पहल की वजह से ही अब अगले वक्त की रोटी की जुगाड मे सडको पर भटनेके बजाय जीवन संध्या काल मे भक्ति मे लगी है.

 

ये विधवा मॉ आज होली पर खास तौर पर अपने बॉके बंके बिहारी से मिलने मंदिर मे आयी है. दरसल वृदांवन की होली मे भारतीय संस्कृति के अद्भुत रंग बिखरे हैं , और वृंदावन ्के मशहूर बांके बिहारी मंदिर के बारे मे तो कहा जाता है कि कोमल ह्रदय बांके बिहारी जी भक्‍तों की भक्ति से इतना प्रभावित हो जाते है कि मंदिर से निकलकर भक्‍तों के साथ हो लेते है,कितने ही किस्से कहानी श्रधालु इस बारे मे सुना रहे है. श्र्धालु बता रहे है इसीलिए उन्हें परदे मे रख कर उनकी क्षणिक झलक ही भकतों को दिखाई जाती है। पुजारियों का एक समूह दर्शन के वक्‍त लगातार मूर्ति के सामने पड़े पर्दे को खिंचता, गिराता रहता है और श्रद्धालु दर्शन करते रहते है।



साध्वी पर्दे के पीछे की बांके बिहारी जी की इसी लुका छिपी से व्यथित जीवन संध्या काल मे भक्ति मे लगी होकर ही बरसती आंखों से गुहार कर रही थीं। पास खड़े एक श्रद्धालु बताते है, ऐसे ही है हमारे बांके बिहारी सबसे अलग अनूठे। इस मंदिर के नये स्वरूप को 1864 में गोस्वामियो ने बनवाया गया था। विस्मित से एक भक्‍त बता रहे हैं, एक बार राजस्थान की एक राजकुमारी बांके बिहारी जी के दर्शनार्थ आई लेकिन वो इनकी भक्ति में इतनी डूब गई कि वापस जाना ही नहीं चाहती थी। परेशान घरवाले जब उन्हें जबरन घर साथ ले जाने लगे तो उसकी भक्ति या कहे व्यथा से द्रवित होकर बांके बिहारी जी भी उसके साथ चल दिये। इधर मंदिर में बांके बिहारी जी के गायब होने से भक्‍त बहुत दुखी थे, आखिरकार समझा बुझाकर उन्हें वापस लाया गया। भक्‍त बताते हैं ' यह पर्दा तभी से डाल दिया गया, ताकि बिहारी जी भक्त से ज़्यादा देर तक आँखे चार न कर सकें, कभी किसी भक्‍त के साथ उठकर नहीं चल दें और भक्‍त उनके क्षणिक दर्शन कर पायें, सिर्क झलक ही देख पाये ' कहा यह भी कहा जाता है कि उन्हें बुरी नजर से बचाने के लिये पर्दा रखा जाता है,क्‍योंकि बाल कृष्ण को कहीं नजर नहीं लग जाये. प्रचलित लोक कथायों के अनुसार कई बार बांके बिहारी कृष्ण ऐसा कर भी चुके हैं,मंदिर से गायब हो चुके है इसीलिये की जाती है उन लिये ये पर्देदारी ...एक शृद्धालु के अनुसार' मंदिर मे दर्शनार्थ आये शृद्धालु बार बार उनकी झलक पाना चाहते हैं लेकिन पलक झपकते ही वो अंतर्ध्यान हो जाते हैं उनके पास खड़े एक श्रद्धालु बताते है, वे तो सबसे अलग है,अनूठे। ये पर्दा डाला ही है इसलिये कि भक्त बिहारी जी से ज़्यादा देर तक आँखे चार न कर सकें क्योंकि कोमल हृदय बिहारी जी भक्‍तों की भक्ति व उनकी व्यथा से इतना द्रवित हो जाते है कि मंदिर मे अपने आसन से उठ कर भक्‍तों के साथ हो लेते है. वो कई बार ऐसा कर चुके हैं इसलिये अब ये पर्दा डाल दिया गया है ताकि वे टिककर बैठे उनका भोला सा स्पष्टीकरण है 'अगर ये एक भक्त के साथ चल दिये तो बाकियों का क्या होगा?..'भीड़ मे खड़ी एक फ्रांसिसी युवती टूटी फूटी अंग्रेजी मे पूछती है' क्या यह सच मे हमारे साथ चल सकते है'लंदन मे बसी एक् प्रवासी भारतीय कहती है'इतना सुना था बांके बिहारी जी के बारे मे, खास तौर पर हम इन के दर्शन के लिये आये है.' मुस्कराते हुए कहती है " अगर हमारे साथ चल दिये तो हम तो कृतार्थ हो जायेंगे' 



बंगाल से आये एक भक्त बता रहे हैं' सिर्फ जनमाष्ट्मी को ही बांके बिहारी जी के रात को महाभिषेक के बाद रात भर भक्तों को दर्शन देते हैं और तड़के ही आरती के बाद मंदिर के कपाट बंद कर दिये जाते हैं वैसे मथुरा वृंदावन मे जन्माष्ट्मी का उत्सव पर्व से सात आठ दिन पहले ही शुरू हो जाता है. और होली तो यहा की अदभुत, दैवीय ही होती है, सभी होली के रंगो से सराबोर लेकिन यह भक्ति और श्रद्धा के रंग है. इसी महिमा के चलते होली के पर्व से पहले ही यहा दर्शानर्थियो की भीड़ लग जाती है, भीड़ सभी मंदिरो मे उमड़ती है लेकिन बांके बिहारी मंदिर तो जन सैलाब बन जाता है. दरअसल वृदांवन नगरी इन दोनो पर्वो पर उत्सव नगरी ्सी बन जाती है और देश विदेश से दर्शक और श्रधालु यहा खिंचे चले आते है. कहा जाता है कि सन 1863 मे स्वामी हरिदास को बांके बिहारी जी के दर्शन हुए थे तब यह प्रतिमा निधिवन मे थी, पर गोस्वामियों के एक वर्ष 1864 मे बाद इस मंदिर को बनवाने के बाद इस प्रतिमा को इस मंदिर मे प्रतिष्ठापित किया गया.

 

पूरे वृंदावन मे कृष्ण लीला का तिलिस्म चप्पे चप्पे पर बिखरा हुआ है.चप्पे पर देशी विदेशी कृष्ण भक्त नजर आ्ते है, कोई वहा वृदावन नगरी की 'आठ कोसी परिक्रमा ' कर रहा है, कही मंदिर के प्रागड़ मे भजन कीर्तन हो रहा है,इतनी कहानिया इतने किस्से कृष्ण भक्तों के अनन्य प्रेम को लेकर.. 

राजस्थान के एक अन्य भक्त बताते है कि यह मंदिर शायद अपनी तरह का पहला मंदिर है जहाँ सिर्फ इस भावना से कि कहीं बांकेबिहारी की नींद मे खलल न पड़ जाये इसलिये सुबह घंटे नही बजाये जाते बल्कि उन्हे हौले हौले एक बालक कई तरह दुलार कर उठाया जाता है, इसी तरह संध्या आरती के वक्त भी घंटे नही बजाये जाते ताकि वे शांति से रहे.गुजरात के एक भक्त ग्यानी कई सी मुद्रा मे बताते है'यह जानकर शायद आप हैरान हो जायेंगे कि बांके बिहारी जी आधी रात को गोपियों के संग रासलीला करने यही के निधिवन मे जाते है और तड़के चार बजे वापस लौट आते हैं' विस्फरित नेत्रो से अपनी व्याख्या को वे और आगे बढाते हुए बताते हैं ' ऐसे ही एक दिन वे जब वे रात को गायब हो गये तो उनका का पंखा झलने वाले एक सेवक की पंखा झलते झलते अचानक आँख लग गयी,चौंक कर देखा तो ठाकुर जी गायब थे. परेशान सेवक को कुछ सूझ ही नही रहा था,इसी आलम मे भोर हो गई और भोर चार बजे अचानक वे वापस आ गये, अगले दिन वही सब कुछ दोबारा पहले जैसा ही हुआ तो सेवक ने ठाकुर जी का पीछा किया और ये राज़ खुला कि ठाकुर जी निधिवन मे जाते हैं तभी से सुबह की मंगल आरती की समय थोड़ा देर से कर दिया जिससे रतजगे से आये ठाकुर जी की अधूरी नींद पूरी हो सके. 



अक्सर भक्तगण कान्हा की बांसुरी की धुन, निधिवन मे नृत्य की आवाज़े आदि के बारे मे किस्से यह कह के सुनाते हैं कि 'हमे किसी ने बताया है..'...' ऐसे कितने ही किस्से कहानियां वृंदावन के चप्पे चप्पे पर बिखरी हुई हैं. कितनी ही "मीरायें" वृंदावन मे आपको कृष्ण के सहारे ज़िंदगी की गाड़ी को आगे बढाती हुई नज़र आयेंगी इस जीवन मे कृष्ण ही इनके जीवन का सहारा है. इन मीराओ की कहानिया तो हम सब ने सुनी है लेकिन भगवान के भक्त के प्रति प्रेम के यहा के यह किस्से अदभुत है.इस अटूट आस्था के सम्मुख तर्क बेमायने है.आस्था पर सिर्फ विश्वास ौर विश्वास. 



विध्वा मॉ अब भी पर्दे के पीछे की बांके बिहारी जी की इसी लुका छिपी से व्यथित होकर ही बरसती आंखों से गुहार कर रही थीं। .बांके बिहारी की एक झलक दर्शन के बाद मंदिर से वापसी...रंगो से सराबोर श्रद्धालु है चारो और,और बीच बीच मे राधे राधे के बोल मंदिर के बाहर निकलते ही संकरी सी गली मे बनी किसी दुकान पर गायिका शुभा मुदगल की आवाज़ मे गाया गया एकगीत महौल मे एक अजीब सी शांति और अजीब सी बेचैनी बिखेर रहा है 'वापस गोकुल चल मथुराराज.... , राजकाज मन न लगाओ, मथुरा नगरपति काहे तुम गोकुल जाओ?'.. विधवा मॉ के साथ बांके बिहारी को साथ चलने का का आग्रह तो शायद सभी भक्त कर रहे है...वीएनआई



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